बागेश्वर। बागेश्वर जिले की ढाई लाख की आबादी को स्वास्थ्य सुविधा देने के नाम पर करोड़ों की लागत से ब्लड बैंक का भवन तो बना दिया गया, लेकिन तीन साल बाद भी विभाग ब्लड बैंक को संचालित करने के लिए लाइसेंस तक हासिल नहीं कर सका। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद स्वास्थ्य महकमा और सरकार नींद से जागे हैं।
बागेश्वर जिले में एक जिला अस्पताल और दो सीएचसी सहित कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। इसके बावजूद स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में जिला बेहद पिछड़ा है। यहां के जिला अस्पताल में फिजीशियन और बाल रोग विशेषज्ञ तक नहीं हैं। रेफर किए जाने वाले मरीजों के लिए सबसे नजदीकी अस्पताल 70 किमी दूर अल्मोड़ा का बेस अस्पताल है।
एक्सीडेंटल, डिलीवरी सहित विभिन्न मामलों में आए दिन मरीजों को ब्लड की जरूरत होती है। परंतु यहां पर ब्लड बैंक नहीं होने से मरीज को रेफर कर दिया जाता है। समय पर खून नहीं मिलने से कई बार मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। इसी दर्द को देखते हुए यहां पर लाखों की लागत से ब्लड बैंक का भवन बनाया गया, लेकिन बिल्डिंग बनने के बाद इसके संचालन की कार्रवाई करने के बजाय महकमा चुपचाप बैठ गया।
संचालन नहीं होने से नई बिल्डिंग खस्ताहाल हो गई। तीन साल तक भी ब्लड बैंक नहीं खुलने पर आखिरकार नागरिक मंच की ओर से इस मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करनी पड़ी। हाईकोर्ट ने सरकार को स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए तो विभाग ने फाइल दौड़ानी शुरू की तब पता चला कि ब्लड बैंक का संचालन बिना लाइसेंस के हो ही नहीं सकता है।
ब्लड बैंक के लाइसेंस की प्रक्रिया बेहद लंबी है। इसका लाइसेंस केंद्र सरकार की ओर से जारी होता है। विभाग ने लाइसेंस के लिए आवेदन किया है। अब देखना यह है कि तीन सालों से लावारिस पड़े ब्लड बैंक भवन का संचालन कब होता है।