बागेश्वर। राज्य गठन के बाद से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर गढ़वाल का दबदबा रहा है। भाजपा के शासनकाल में केवल एक बार कुमाऊं के जनप्रतिनिधि को मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल हुई है। वहीं कांग्रेस ने दो बार कुमाऊं की झोली में यह अहम जिम्मेदारी डाली है। इस बार लोगों को उम्मीद थी कि बचे हुए कार्यकाल के लिए कुमाऊं के किसी नेता को भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व यह जिम्मेदारी देगा लेकिन इस बार भी भाजपा नेतृत्व ने कुमाऊं की अपेक्षा गढ़वाल को तबज्जो दी।
9 नवंबर 2000 को राज्य की स्थापना हुई। भाजपा नेतृत्व ने नित्यानंद स्वामी को अंतरिम सरकार के सीएम पद का तोहफा दिया। स्वामी 9 नवंबर से 29 अक्तूबर तक सीएम की कुर्सी पर रहे। भाजपा ने राज्य के पहले विधानसभा चुनाव से पहले खांटी संघी भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाकर कुमाऊं को प्रतिनिधित्व दिया था। कोश्यारी 30 अक्तूबर से एक मार्च तक अल्प समय के लिए सीएम की कुर्सी पर रहे। वर्ष 2002 में कांग्रेस सत्ता में आई। कांग्रेस ने अनुभवी नेता एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी।
वर्ष 2007 के चुनाव में भाजपा ने पहले ही साफ कर दिया था कि सीएम की कुर्सी गढ़वाल के हिस्से जाएगी। 2007 का चुनाव खंडूड़ी हैं जरूरी नारे के साथ लड़ा और जीता। भुवन चंद्र खंडूड़ी सीएम बने। वर्ष 2009 में भाजपा के भीतर खटपट हुई तो शीर्ष नेतृत्व ने एक बार फिर नेतृत्व परिवर्तन किया और गढ़वाल से ही ताल्लुक रखने वाले डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को 30 जून 2009 को मुख्यमंत्री की कुर्सी नवाजी। वर्ष 2012 के चुनाव नजदीक आते-आते एक बार फिर भाजपा ने नेतृत्व परिवर्तन कर 11 सितंबर 2011 को भुवन चंद्र खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनाया।
वर्ष 2012 में कांग्रेस सत्ता में आई। अपेक्षा के विपरीत विजय बहुगुणा को सीएम की कुर्सी हासिल हुई। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य को लेकर सरकार की किरकिरी के बीच बहुगुणा को कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। एक फरवरी 2014 को कुमाऊं के खांटी कांग्रेस नेता हरीश रावत को सीएम बनाया गया। वर्ष 2017 के चुनाव में भाजपा विजयी हुई और त्रिवेंद्र सिंह रावत पर भाजपा नेतृत्व ने भरोसा जताया। बीते 9 मार्च को त्रिवेंद्र सिंह रावत की विदाई हुई तो एक बार फिर गढ़वाल से ताल्लुक रखने वाले तीरथ सिंह रावत पर भाजपा ने भरोसा किया है। इस बार कुमाऊं और गढ़वाल के बीच संतुलन बनाए रखने के
लिए एक उप मुख्यमंत्री बनाने की बात भी की जा रही है। बृहस्पतिवार को संभावित मंत्रिमंडल के गठन से इसकी तस्वीर साफ होगी। (संवाद)
त्रिवेंद्र सरकार ने मंत्रिमंडल में जगह देने में भी की कंजूसी
बागेश्वर। त्रिवेंद्र सरकार ने मंत्रिमंडल में भी कुमाऊं को प्रतिनिधित्व देने में कंजूसी की थी। सरकार के गठन के बाद कुमाऊं से प्रकाश पंत, यशपाल आर्य, अरविंद पांडे और रेखा आर्य को ही मंत्रिमंडल में स्थान मिल पाया। बागेश्वर और चंपावत जिले को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं मिला। 5 जून 2019 को कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत के निधन के बाद मंत्रिमंडल में कुमाऊं का प्रतिनिधित्व और घट गया। तब से पिथौरागढ़ जिले का भी मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं रहा। तीरथ सरकार में कुमाऊं को मंत्रिमंडल में कितना प्रतिनिधित्व मिलता है, यह देखने वाली बात होगी।