बागेश्वर। सरयू और गोमती के संगम पर स्थित भगवान बागनाथ का मंदिर प्रमुख शिव धामों में शुमार है। मान्यता है कि यहां भगवान बागनाथ बाग के रूप में प्रकट हुए थे। इसीलिए इस स्थान का नाम ब्याघ्रेश्वर या बागीश्वर पड़ा जो बाद में बागेश्वर कहलाया। बागनाथ धाम में श्रावण मास में पूजा का विशेष विधान है। मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगता है।
मान्यता के अनुसार जब मुनि वशिष्ठ परंपिता ब्रह्मा के कमंडल से निकली मां सरयू को ला रहे थे। जैसे ही सरयू कत्यूर घाटी में गोमती के संगम पर पहुंची तो वहां ब्रह्मकपाली के पास ऋषि मार्कंडेय तपस्या में लीन थे। ऋषि मार्कंजेय की तपस्या भंग न हो, इसलिए सरयू वहां रुक गई। देखते ही देखते जलभराव होने लगा। ऋषि वशिष्ठ ने शिवजी की आराधना की। प्रार्थना से प्रसन्न भगवान शंकर ने बाघ का रूप धारण कर मां पार्वती को गाय बना दिया। ब्रह्मकपाली के पास बाघ ने गाय पर झपटने का प्रयास किया। गाय के रंभाने से मार्कंडेय मुनि की आंखें खुल गई। वह गाय को बचाने के लिए दौड़े तो बाघ भगवान शंकर और गाय माता पार्वती के रूप में सामने आ गए। इसीलिए इस स्थान को ब्याघ्रेश्वर कहा जाने लगा। जो कालांतर में बदलकर बागीश्वर और बाद में बागेश्वर कहलाने लगा। इस बार लॉकडाउन के कारण मंदिर आम लोगों के दर्शनों के लिए बंद है। 18 जुलाई से एक बार फिर मंदिर के कपाट खुलने जा रहे हैं।