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15 सितंबर 1997: अल्मोड़ा से अलग हुआ बागेश्वर, बना उत्तराखंड का 12वां जिला; आज पलायन पर अटकी है विकास की रफ्तार

Tue, 15 Sep 2026 12:25 PM IST
Heera कमल कांडपाल

सार

15 सितंबर 1997 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने बागेश्वर को अल्मोड़ा जिले से अलग कर उत्तराखंड (तब यूपी) का 12वां जिला घोषित किया था। सरयू और गोमती के पवित्र संगम पर बसा यह भूभाग धार्मिक, सांस्कृतिक और सामरिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
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बागेश्वर जिला मुख्यालय का नजारा। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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15 सितंबर 1997 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के दौरान बागेश्वर को अल्मोड़ा जिले से अलग कर उत्तराखंड (तब यूपी) का 12वां जिला घोषित किया गया था। सरयू और गोमती के पवित्र संगम पर बसा यह भूभाग धार्मिक, सांस्कृतिक और सामरिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। शुरुआती दौर में बागेश्वर, कपकोट और गरुड़ तहसीलों को मिलाकर जिले का स्वरूप तय हुआ था, जिसमें बाद में कांडा, शामा और दुगनाकुरी जैसी नई प्रशासनिक इकाइयां जुड़ीं।

जिला बनने से पहलेजिले के दुर्गम क्षेत्रों के ग्रामीणों को छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्यों के लिए अल्मोड़ा की लंबी दौड़ लगानी पड़ती थी। इस भौगोलिक दूरी को खत्म करने के लिए स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग, छात्र संगठनों और जन-संगठनों ने लंबा आंदोलन चलाया। तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष अल्मोड़ा जोहार सिंह परिहार ने बसपा रैली के माध्यम से तत्कालीन सीएम मायावती के सम्मुख बागेश्वर को जिला बनाने की शर्त रखी। बागेश्वर जिला बनाओ संघर्ष समिति के नेतृत्वकर्ता स्वर्गीय गुसाईं सिंह दफौटी ने कई बार जेल यात्राएं सहीं और लगभग सात महीने सेंट्रल जेल में बिताए। उन्होंने नौ से 10 दिनों तक आमरण अनशन कर अपनी जान जोखिम में डालकर इस जिले के सपने को साकार किया था।

ऐसे अस्तित्व में आया बागेश्वर

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बागेश्वर जिला बनाओ संघर्ष समिति के बैनर तले मेरे पति ने सात महीने सेंट्रल जेल में काटे। 1994-95 के दौरान नौ से 10 दिन तक आमरण अनशन पर रहे, डॉक्टरों और सरकार के दबाव के बावजूद संघर्ष जारी रखा। पुलिस की प्रताड़ना पूरे परिवार ने झेली। जिला तो बन गया, लेकिन जिन आंदोलनकारियों ने अपना जीवन खपाया, उन्हें सरकारों ने अनदेखा ही किया। नीमा दफौटी पत्नी, स्व. गुसाईं सिंह दफौटी, आंदोलनकारी

29 साल बाद भी अधूरी उम्मीदें
बसपा ज्वाइन करने के दौरान अल्मोड़ा की ऐतिहासिक रैली में बागेश्वर को जिला और कपकोट को तहसील बनाने की शर्त रखी थी, जिसे मान लिया गया। उम्मीद थी कि जिला बनने से विकास नीचे तक पहुंचेगा। लेकिन जिले का डीएम भी यहां ट्रेनिंग पीरियड में भेजा जाता है। कपकोट तहसील में स्टाफ न होने से काम ठप रहते हैं और जिला मुख्यालय तक पहुंचने में आम आदमी को आज भी दुश्वारियां होती हैं। जोहार सिंह परिहार, पूर्व जिपं अध्यक्ष, अल्मोड़ा

 

उपलब्धियां और जनआकांक्षाएं

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जिला बनने के बाद प्रशासनिक सुलभता बढ़ी है। कलेक्ट्रेट, विकास भवन, जिला अस्पताल, डिग्री कॉलेज और पुलिस लाइन की स्थापना से जनता को अब अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए दूर नहीं भागना पड़ता। सड़क नेटवर्क का विस्तार दूरस्थ गांवों तक हुआ है। मेलाडुंगरी हेलीपैड से हल्द्वानी और दिल्ली के लिए हेली सेवा शुरू होने से यात्रा का समय घट गया है। प्रशासनिक दृष्टि से कपकोट और गरुड़ नगर पंचायत अस्तित्व में आए, शामा उप-तहसील बनी, दुगनाकुरी और काफलीगैर तहसीलें गठित हुईं। हालांकि, कांडा ब्लॉक के गठन की मांग को लेकर क्षेत्रीय जनता का संघर्ष आज भी जारी है।

धरातलीय धरातल और कसक
29 साल बीत जाने के बाद भी जिला पूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए तरस रहा है। जल संस्थान, एआरटीओ, सेवायोजन, श्रम विभाग और वन निगम आज भी किराए के भवनों में संचालित हो रहे हैं। जिला अस्पताल का अपना अलग भवन तक नहीं बन सका है, यह सीएचसी के भवन में ही चल रहा है और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी के कारण महज एक रेफर सेंटर बना हुआ है। युवाओं के लिए जिले में एक भी खेल स्टेडियम अस्तित्व में नहीं आ सका। रोडवेज डिपो बनने के बाद भी कार्यशाला का निर्माण अधूरा रहने से उसका पूर्ण संचालन अटका है। बदियाकोट, कुवांरी, बोरबलड़ा और दाबूं हड़ाप जैसे सीमांत क्षेत्रों में ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत हैं। शहर में सरयू पुल पर भारी वाहनों की नो-एंट्री/हाइट गेज का मुद्दा, खस्ताहाल सड़कें, डंपिंग जोन का अभाव और 1913 के पुराने पुलों के स्थान पर नए स्टील ढांचे के निर्माण की धीमी रफ्तार तंत्र की उदासीनता को बयां करती है।

अतीत का झरोखा
15 सितंबर 1997 को जब पहले कलेक्ट्रेट का उद्घाटन हुआ और प्रशासनिक दफ्तर खुले, तो दूर-दराज के ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों और छोलिया नृत्य के साथ जश्न मनाया था। पर्यावरणविद और जानकार किशन सिंह मलड़ा ने बताया कि जिला बनते ही नगर में रैली निकाली गई और तत्कालीन सीएम मायावती और जोहार सिंह परिहार के जयकारे लगे।

29 वर्षों में जिले में एक भी ऐसा उद्योग स्थापित नहीं हो पाया जहां 20 से अधिक लोगों को रोजगार मिल सके। मैग्नेसाइट फैक्टरी घाटे की मार झेल रही है। तीन दशक पहले भी लोग सड़क और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे थे, आज भी वही स्थिति है।
दलीप सिंह खेतवाल, उद्योगपति बागेश्वर

प्रशासनिक और राजनीतिक ढांचा जरूर खड़ा हो गया, राष्ट्रीय पार्टियों को जिलाध्यक्ष मिल गए, लेकिन जनपक्ष से जुड़े मुद्दे जहां से शुरू हुए थे, आज भी वहीं खड़े हैं। जिले के दूरस्था लोगों की स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की समस्याओं पर कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। रमेश पांडेय कृषक, राज्य आंदोलनकारी

जिला बनने के बाद बुनियादी सुविधाओं के विस्तार में प्रगति हुई है। सीमांत क्षेत्रों तक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। जो इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य संबंधी कमियां हैं, उन्हें प्राथमिक आधार पर दूर करने के लिए शासन स्तर पर पैरवी की जा रही है। एनएस नबियाल, प्रभारी डीएम और एडीएम बागेश्वर

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