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धधकते जंगलों के बीच पर्यावरण संरक्षण को समर्पित हैं अमस्यारी के बसंत

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बागेश्वर के अमस्यारी में बसंत बल्लभ जोशी का बनाया जंगल। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। जिले में हर ओर जंगल धधक रहे हैं। वन विभाग तमाम संसाधनों के बावजूद आग पर काबू पाने में विफल साबित हो रहा है। इन सबके बीच पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित अमस्यारी गांव के बसंत बल्लभ जोशी वर्ष 1999 से स्वयं का जंगल तैयार कर पेड़ों और पेयजल स्रोतों को बचाने में लगे हैं। उनके प्रयास से सूखने के कगार पर पहुंचा जल स्रोत भी रिचार्ज होने लगा है।
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अमस्यारी के 59 वर्षीय बसंत बल्लभ जोशी ने वर्ष 1990 से पर्यावरण संरक्षण को लेकर काम करना शुरू कर दिया था। वर्ष 1999 में उन्होंने गांव की दस हेक्टेयर बंजर जमीन पर ढाई हजार पौधे रोपकर वन विकसित किया। हालांकि उन्हें ग्रामीणों का सहयोग नहीं मिला और दो साल में ही उनके तैयार किए जंगल को ग्रामीणों ने चरागाह बना डाला। वर्ष 2010 में उन्होंने फिर प्रयास किया और गांव में 1965 के बाद से बंजर पड़ी नाप जमीन पर पौधरोपण करना शुरू कर दिया। इस बार कुछ ग्रामीणों का उन्हें सहयोग मिला। इसके बाद से उनके तैयार वन में पेड़ों की संख्या बढ़ने लगी। वह हर साल बारिश के दौरान वन विभाग, उद्यान विभाग, वृक्ष पुरुष किशन सिंह मलड़ा की वाटिका से लाकर अपने वन में पौधरोपण करते हैं। वर्तमान में उनके तैयार किए जंगल में बांज, बुरांस, उतीस, काफल, बैंस, अनार, अमरूद, रिंगाल, आंवला, पांकड़, तिमिल सहित विभिन्न प्रजातियों के पांच हजार से अधिक पेड़-पौधे हैं। इस वन की सुरक्षा में उनकी पत्नी चंद्रा देवी और बच्चे भी मदद करते हैं। (संवाद)
चार बार जंगल जलाने का हो चुका है प्रयास
बागेश्वर। पर्यावरण प्रेमी बसंत जोशी को अब भी वन को बचाने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। गांव के कुछ लोग बार-बार वन को आग के हवाले कर देते हैं। वर्ष 2018 से 21 तक चार बार उनके जंगल को जलाकर नष्ट करने का प्रयास हो चुका है, लेकिन उनके दिन-रात जंगल की देखभाल करने के चलते जंगल आग से बचा हुआ है।
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सड़क कटान में बचाए 270 पेड़
बागेश्वर। पेड़ों की सुरक्षा के लिए बसंत प्रशासन के खिलाफ केस भी लड़ रहे हैं। वर्ष 2018 में सड़क कटान के दौरान उनके जंगल के 125 पेड़ों को काटा जा रहा था। वन विभाग और लोनिवि ने 35 पेड़ काट भी डाले थे, लेकिन बाकी 80 पेड़ों को बचाने के लिए जोशी ने वन विभाग और लोनिवि पर मुकदमा दर्ज करा दिया। आज भी यह केस न्यायालय में चल रहा है। इसके अलावा बुंगा गांव में भी उन्होंने सड़क कटान की जद में आ रहे 180 पेड़ों को बचाया है।
सलज्यू गधेरे का जलस्रोत होने लगा रिचार्ज
बागेश्वर। बसंत की मेहनत और लगन से सूखने की कगार पर पहुंच चुका पेयजल स्रोत सलज्यू गधेरा फिर से रिचार्ज होने लगा है। हरनिगरी के उद्गम स्थल से आने वाले इस गधेरे पर वर्ष 2008 में चाय बागान के लिए ट्यूबवेल का निर्माण कराया गया था। जिसके कारण गधेरे में पानी घट गया और नीचे के गांवों में पानी का संकट गहराने लगा। जोशी ने बांज, बुरांस, उतीस के पौध बहुतायत में रोपे हैं। पौधों के पेड़ बनने के साथ ही जलस्रोत में भी पानी का स्तर बढ़ने लगा है।
बच्चों को पर्यावरण संरक्षण के लिए करते हैं प्रेरित
बागेश्वर। तमाम मुश्किलों का सामना करने के बावजूद बसंत पर्यावरण संरक्षण की मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं। खाली समय में वह क्षेत्र के विद्यालयों में जाकर छात्र-छात्राओं को पर्यावरण और जल संरक्षण के लिए प्रेरित करते हैं। उनके प्रयासों से गांव के कई युवा अग्निकाल में वनों को आग से बचाने और पौधरोपण अभियान में सहयोग कर रहे हैं।(संवाद)
रावत और निशंक कर चुके हैं सम्मानित
बागेश्वर। बसंत जोशी को पर्यावरण संरक्षण और जन जागरूकता कार्यक्रमों में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत सम्मानित कर चुके हैं। 26 जनवरी 2020 को वन विभाग के विभागाध्यक्ष जयराज ने और इसी वर्ष बदरीनाथ के प्रभागीय वनाधिकारी भी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं। वर्ष 2018 में उन्हें तत्कालीन राज्यसभा सदस्य भगत सिंह कोश्यारी ने भी प्रशस्ति पत्र देकर उनके पर्यावरण संरक्षण के कार्यों की सराहना की थी। (संवाद)
कोट
विकास की दौड़ में पर्यावरण और जल संरक्षण के कार्यों की उपेक्षा हो रही है। इसके परिणाम आने वाले समय में घातक हो सकते हैं। पेड़-पौधे, नदियों और जल स्रोतों को बचाने के लिए सभी को आगे आना होगा, तभी हम आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य प्रदान कर सकेंगे।
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बसंत बल्लभ जोशी, पर्यावरण प्रेमी अमस्यारी

बसंत बल्लभ जोशी।- फोटो : BAGESHWAR

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