बागेश्वर में मंगलवार से शुरू हो रहा उत्तरायणी कौतिक जिले की प्राचीन परंपरा और संस्कृति का प्रमुख प्रतीक माना जाता है।
बागेश्वर जिले में आज से शुरू होने वाले उत्तरायणी कौतिक का इतिहास पुरातन काल से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि कत्यूरी राजाओं के शासन काल में भी संगम पर मकर संक्रांति के दिन मेला लगता था। चंद राजाओं ने बागनाथ मंदिर को नया स्वरूप प्रदान किया तो मेले का विस्तार भी किया। बहुआयामी कौतिक का स्वरूप धीरे-धीरे बढ़ता चला गया। वर्तमान में सात दिनों तक चलने वाले मेले में हर साल लाखों मेलार्थी पहुंचते हैं।
उत्तरायणी कौतिक का मूल स्वरूप बागेश्वर से जुड़ा माना जाता है। शुरूआत में मेला भले ही केवल धार्मिक स्वरूप में रहा है, लेकिन कालांतर में इसमें कई आयाम जुड़ते चले गए। धार्मिक महत्व से निकलकर मेला व्यापारिक हुआ। देश के बाहर से भी कारोबारी मेले में व्यापार करने आने लगे। संस्कृतियों के आदान-प्रदान ने मेले को सांस्कृतिक पक्ष को मजबूती दी। 1921 में हुए कुली बेगार आंदोलन ने इसे राजनीतिक रूप से सशक्त किया। शुरूआत में केवल त्रिमाघी के लिए श्रद्धालु आते थे, अब उन्हें मेले में कई रंग देखने को मिलते हैं। सात दिनों तक बाबा बागनाथ की नगरी में पूजा-पाठ, गीत-संगीत की गूंज सुनाई देती है।
सातवीं शताब्दी से जुड़ा है उत्तरायणी मेले का इतिहास
जिले के इतिहास के जानकार रमेश पांडेय कृषक बताते हैं कि बागनाथ मंदिर का संबंध कत्यूरी राजाओं से रहा है। कत्यूरी राजा बाबा बागनाथ को राज राजेश्वर मानते थे। सातवीं सदी में भी बागनाथ की इस नगरी में मकर संक्रांति के दिन मेला लगता था। चंद राजा लक्ष्मीचंद ने मंदिर को नया रूप प्रदान किया तो मेले को सांस्कृतिक रूप मिला। दूरदराज से आने वाले लोगों ने झोड़े-चांचरी, बैर, भगनौल को बढ़ावा दिया।
भारत-चीन युद्ध से पहले व्यापारियों के लिए कोई सीमा रेखा नहीं होने से हिमालयी व्यापार को बढ़ावा मिला। ऊपरी क्षेत्रों में बर्फ गिरने से व्यापारी अपना सामान लेकर चले आते थे। उस दौरान में वस्तु से वस्तु का आदान-प्रदान यानि वस्तु विनिमय का चलन था। 1819 से चले आ रहे कुली बेगार प्रथा के विरोध का आंदोलन इसी उत्तरायणी मेले में 100 साल बाद सफल रहा। उत्तरायणी ही इस ऐतिहासिक रक्तहीन आंदोलन का गवाह बनी।
तिब्बत, नेपाल, चीन समेत दक्षिण भारत से आते थे व्यापारी