उत्तराखंड राज्य बने 16 साल बीत गए हैं। इस डेढ़ दशक के भीतर कई सरकारें आई और चली गई। राज्य गठन के बाद नेताओं की खूब पैदावार हुई और फले फूले, परंतु पीढ़ियों से हाड़ तोड़ मेहनत करने वाले हजारों किसानों को हाशिए में रखने के कारण उनके खेत सुविधाओं के अभाव में बंजर हो गए। कुछ यही हाल बागेश्वर जिले का भी है जहां पर राजनीतिक दलों द्वारा किसानों का इस्तेमाल महज वोट बैंक के रूप में करने के कारण 10 हजार से अधिक परिवार खेतीबाड़ी से दूर हो चुके हैं।
ढाई लाख की आबादी वाले बागेश्वर जिले में 54 हजार किसान हैं। यह किसान लगभग 17 हजार हेक्टेअर में रबी और इतनी ही जमीन में खरीफ की फसलों को उगाते हैं। पीढ़ियों से मौसमी बारिश पर निर्भर इन किसानों को आज तक सिंचाई की सुविधा नहीं मिल सकी है। चारों ओर नदियों से घिरा होने के बावजूद बागेश्वर जिले में महज पांच हजार हेक्टेअर कृषि भूमि में ही सिंचाई की सुविधा है। राज्य गठन के बाद इन किसानों को उम्मीद थी कि उन्हें सिंचाई की सुविधा मिलेगी, परंतु पिछले डेढ़ दशक में सिंचाई की सुविधा तो दूर पेयजल योजनाएं तक नहीं बन सकीं, जिससे उनकी प्यास बुझ सके। जिले में बनाई गई लगभग दो सौ छोटी-बड़ी नहरों में से तीन दर्जन से अधिक नहरें पानी की कमी, मलबा भरने या फिर अन्य कारणों से वर्ष भर आंशिक या पूर्ण रूप से बंद ही रहती हैं। पिछले एक दशक से पहाड़ में जंगली जानवरों का आतंक बढ़ा है।
बंदरों और सुअरों की समस्या के कारण खेतों में हाड़ तोड़ मेहनत करने वाले किसान की मेहनत बेकार जा रही है। बंदरों की समस्या से निपटने के लिए पिछले चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के नेताओं ने बंदर बाड़ा बनाने के वादे तो किए, लेकिन आज तक धरातल में कुछ नहीं हो सका। चुनावों में नेता किसानों को आश्वासन तो देते हैं लेकिन सत्ता मिलते ही उन्हें पूरी तरह से भुला दिया जाता है।