रामलीला हो या अन्य समारोह उनमें हास्यकला ना हो तो वह फीका सा लगता है। यह कला इन समारोहों में शमां बांधने में अपना महत्वपूर्ण रोल अदा करती हैं। यहां चल रही रामलीला में पाली ऐठाण निवासी लक्ष्मण सिंह ऐठानी उर्फ लछम दा 32 साल से हास्यकला का प्रदर्शन करते आ रहे हैं। उनके टेलेंट का तो कोई जवाब नहीं है। वह मंच पर बगैर पूर्व तैयारी के आते हैं और दर्शकों का रुख भांपते ही अपनी कला पेश कर लोगों को लोटपोट कर देते हैं। इस बार उन्होंने बंदरों का आतंक, पलायन और महंगाई पर अधिक फोकस किया है। उनकी प्रस्तुुति बूबू जारिन ग्वरूंक ग्वाव, आम जा रे स्यार, दाज्यू हमार नौकरी में भौजि ड्यार में...का लोग खूब लुत्फ उठा रहे हैं।
नगर पंचायत के पाली निवासी दिवंगत पूर्व सैनिक मादो सिंह ऐठानी और माता भगवती देवी के घर एक मार्च 1963 में जन्मे लक्ष्मण को बचपन से हास्यकला में रुचि थी। इंटर पास लछम दा ने नेहरू युवा केंद्र अल्मोड़ा से जुड़कर जहां समाज सेवा को हाथ में लिया वहीं हास्यकला की विधा को भी धार दी। उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन 1983 से शुरू किया। उनके मंच पर आते ही लोगों की हंसी छूटनी शुरू हो जाती हैं। वह अपनी प्रस्तुति की शुरुआत सम्मानित मैसों और पढ़ी-लिखी सैंणियो मेरि नमस्कार से करते हैं। इस बार उन्होंने खास तौर पर बंदरों से कृषि पर पड़ रहे बुरा असर पर आधारित रचना नानतिन भतेर दुबकि रंई, बानर जा रई स्यार में...महंगाई पर उनकी रचना हमें तो लूट लिया आटा, चावल और दालों ने, धनिया, मिर्च और गरम मसालों ने बिगाड़ा जायका... पेशकर सभी को लोटपोट कर रहे हैं। वह कहते हैं हास्य कला ऐसी विधा है इससे सामाजिक सरोकारों, देेेश-विदेश में घटने वाली घटनाओं, नशाखोरी और पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरों के अलावा कई अन्य विषयों पर समाज का ध्यान आकृष्ट करने का मौका मिलता है। वह कपकोट के साथ भराड़ी की रामलीला में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। उनकी पत्नी सरस्वती नगर पंचायत की सभासद हैं। लछम दा की आजीविका का जरिया अपनी जीप है। अधिकतर लोग उन्हें लछमू जोकर से ही जानते हैं।