बागेश्वर। एक माह की छुट्टी के बाद मजदूर काम पर लौट आए हैं। इससे निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माणकर्ताओं को बड़ी राहत मिली है। ये मजदूर चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ ही लंबी छुट्टी पर चले गए थे। इससे तमाम निर्माणाधीन सरकारी, गैर सरकारी काम ठप होने के साथ ही निर्माण क्षेत्र की रफ्तार भी थम गई थी। चुनाव समीक्षकों की मानें तो मजदूरों ने प्रत्याशियों के शक्ति प्रदर्शन के दौरान भीड़तंत्र के तिलिस्म का जादू चलाने में अहम किरदार निभाया था।
22 अक्टूबर को निकाय चुनाव की डुगडुगी बजने के बाद लोकतंत्र के इस उत्सव में हर कोई जोशोखरोश से जुटा था। 20 नवंबर को चुनाव नतीजों के एलान तक लोक से लेकर तंत्र तक उत्सव के बराबर भागीदार रहे। लेकिन उत्सव की इस घड़ी में निर्माणकर्ताओं के लिए मुश्किलों के हालात रहे। चुनावी उत्सव के इस एक माह लंबे वक्त में निर्माण क्षेत्र की रफ्तार थम गई थी। निर्माणकर्ता या तो मजदूरों की तलाश में इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे थे। या फिर हाथ पर हाथ धरे नुकसान का सामना करने के लिए मजबूूर थे। अकेले बागेश्वर में ही सैकड़ों सरकारी और गैर सरकारी निर्माण ठप पड़े थे।
दरअसल इन मजदूरों ने निकाय प्रत्याशियों के चुनावी अभियान में शक्ति प्रदर्शन की कमान संभाली थी। चुनावी समीक्षकों का मानना है कि पर्दे के पीछे मजदूरों की फौज ने मतदाताओं पर भीड़तंत्र का जादू चलाने में अहम किरदार निभाया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि शक्ति प्रदर्शन और अपने पक्ष में संख्या बल दिखाने के लिए प्रत्याशी आम तौर पर किराए की भीड़ जुटाते हैं। भीड़तंत्र का मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। इसका तय असर मतदान के ट्रेंड पर पड़ता है। इधर, अब चुनाव निपटने के बाद सभी मजदूर काम पर वापस लौट आए हैं। इससे निर्माण क्षेत्र को बड़ी राहत मिली है। मजदूरों के वापस लौटने से निर्माण स्थलों की रौनक फिर लौटने लगी है।