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जन आंदोलनों को अपने तरीके से धार देते थे शमशेर दा

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बागेश्वर। जन आंदोलनकारी और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट जन आंदोलनों को अपने तरीके से धार देते थे। बुनियादी लड़ाकू होने के साथ ही वह जन सरोकारों के सजग प्रहरी भी थे। उनका बागेश्वर जिले के जन सरोकारों से करीबी रिश्ता था।

वर्ष 1977 में चिपको आंदोलन, 1984 नशा नहीं रोजगार दो और वर्ष 1991 में पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने के लिए शहर से लेकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर लोगों को जागरूक किया। 1993 में जन चेतना मंच के बैनर तले कपकोट के विकास के लिए शुरू हुए आंदोलन को सफल बनाने में शमशेर दा ने पूरा योगदान दिया। मंच के स्वरूप सिंह कर्म्याल और किशन सिंह दानू का कहते हैं डॉ. बिष्ट का मार्गदर्शन इस आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने में कामयाब रहा। वरिष्ठ पत्रकार रमेश पांडेय कृषक कहते हैं 13 जनवरी 1993 को शमशेर दा के सुझाव पर दिवंगत रंगकर्मी गिरीश तिवारी गिर्दा ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन को धार देने के लिए सरयू गोमती संगम में ‘गंग जली उठूंल उत्तराखंड ल्ह्यून...’ जनगीत लिखा। आंदोलनकारियों द्वारा गाए गए इस गीत का नेतृत्व खुद बिष्ट ने किया था।
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कार्यकर्ताओं के सुख दु:ख के सच्चे साथी थे
बागेश्वर। डॉ. शमशेर बिष्ट कार्यकर्ताओं के सुखदु:ख के सच्चे साथी थे। वर्ष 1977 चितई के ग्वल मंदिर में संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ता रमेश कृषक का सुमित्रा कोरंगा से विवाह हुआ। तब सुमित्रा की ओर से शमशेर दा और उनकी पत्नी ने और कृषक की ओर से पीसी तिवारी और उनकी पत्नी ने वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न कराए।
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