बागेश्वर। उत्तराखंड की लोक कलाओं, रीति रिवाजों को संजोने में कई लोक गायकों और कलाकारों का बड़ा योगदान रहा है। इन्हीं में एक नाम कुमाऊं कोकिला कबूतरी दीदी का भी है। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त कुमाऊं कोकिला की खासियत यह थी कि वह गायन में कभी भी वाद्य यंत्रों की मोहताज नहीं रहीं। उनके असमय चले जाने से हर कोई दुखी है। कबूतरी देवी अब शरीर से हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी हृदयस्पर्शी आवाज की खनक हर जगह मौजूद रहेगी।
सोर घाटी के लोक पारंपरिक गीतों की धुन बनाकर उन्मुुत कंठ से गाना कबूतरी जी के जीवन की महानतम उपलब्धि रही। उनकी सुर लहरी में पिथौरागढ़ जिला समेत समूचे कुमाऊं क्षेत्र के पारंपरिक आख्यान निहित हैं। राजकीय महाविद्यालय गरुड़ के असिस्टेंट प्रो. हेम चंद्र दुबे उत्तर कहते हैं कि कबूतरी देवी प्रमुख विधाओं में मंगल गीत, ऋतु रैण, पहाड़ के प्रवासी के दर्द, कृषि गीत, पर्वतीय पर्यावरण, पर्वतीय सौंदर्य की अभिव्यक्ति, भगनौल न्यौली जागर, घनेली झोड़ा और चांचरी प्रमुख रूप से गाती थी।
ऋतरैण में जो भागि जियलो गोरी नौ ऋतु सुणलो...यानि जो भाग्यवान जिएगा वह नौ ऋतुओं को सुनेेगा, फूल देई छम्मा देई भर भकार दैणी द्वार...यानि फूल तुम्हारी दहलीज पर बिखर गए हैं तुम्हारे घर में धन-धान्य भरा रहे समेत कई अन्य गीत गाती थी। उनके गायन शैली में एक मार्मिक स्तर था। जब वो गाती थी तो लोग अवाक रह जाते थे। लोक गायक आनंद कोरंगा ने पहाड़ को ठंडो पाणी... और आज पनी झाऊं -झाऊं... गाकर कबूतरी देेवी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
मंच न मिलने के बावजूद उत्तरायणी मेले में आती रही
बागेश्वर। उत्तरायणी मेला समिति ने कुमाऊं कोकिला कबूतरी देवी को कभी भी मंच पर आमंत्रित नहीं किया लेकिन मेले को लेकर वह खासी उत्साहित रहती थी। मंच न मिलने के बावजूद वह वर्ष 1980 और 90 के दशक में चौक बाजार में बैर, भगनौल गाने वालों के साथ अलग-अलग ऋतुुुओं में गाए जाने वाले ऋतु रैण और अन्य गीतों के जरिए महफिल जमा देती थी। सामाजिक कार्यकर्ता भुवन कांडपाल बताते हैं लोग उनके गायन की शुरूआत होते ही वहां जमा हो जाते थे। पढ़ी लिखी न होने के बावजूद वह विलक्षण प्रतिभा की धनी थी।