बागेश्वर। होली के गीतों में शास्त्रीय संगीत का खास महत्व है। विभिन्न राग रागनियों से भरे संगीत का गायन जो भी करता है या सुनता है वह उसी के रंग में रंग जाता है। भावी पीढ़ी के शास्त्रीय संगीत में रुचि नहीं लेने से होली के पुराने गायक चिंतित हैं।
गायक पंकज पांडेय का कहना है कि पहले बैठकी होली में राग काफी, जंगला काफी, खम्माच, धमार, सहना, जै जैवंत समेत कई अन्य होली गीतों का गायन पौष में ही शुरू हो जाता था। इसमें खास तौर पर युवा वर्ग रुचि रखता था। इन रागों के गायन के लिए युवाओं को होली में ही प्रशिक्षण मिलता था। उनका कहना है कि अब युवा पीढ़ी टीवी और इंटरनेट पर होली कार्यक्रम देखती है, लेकिन पारंपरिक होली गीतों के गायन में रुचि कम ले रही है। युवाओं को अपनी संस्कृति से जुड़े होली को संरक्षित करने के लिए आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि अब पहले की तरह स्वांग भी नहीं होते हैं।
युवा गायक प्रकाश चंद्र जोशी ने कहा कि फास्ट लाइफ के चक्कर में युवा वर्ग एक जगह अधिक समय तक बैठकर गायन करना कम ही पसंद करते हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं को होली गीतों के गायन का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। होली गीतों के गायन की विधा को संरक्षित करने के लिए अभिभावकों को भी आगे आना होगा। बच्चों को होली गीतों के गायन के गुर सिखाने होंगे। इसके अलावा समाज में संस्कृति के संरक्षण के लिए जागरूकता लाने की भी जरूरत है।