अलकनंदा का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। सोमवार 24 जून को भी अलकनंदा ने सेना को पुल बनाने नहीं दिया।
ऐसे में बदरीनाथ से उतर कर लामबगड़ के दूसरे सिरे पर पहुंचे करीब डेढ़ हजार यात्री खुले आसमान के नीचे रात बिताने का मजबूर हैं।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
अलकनंदा के तट पर ही करीब एक किलोमीटर के दायरे में रात होते ही अलाव जलने लगते हैं और सामने जेपी की फ्लडलाइट्स इन्हें मुंह चिढ़ाती हुई लगती है। सेना की एक अकेली रस्सी के सहारे आधा घंटे में एक व्यक्ति पार हो पा रहा है।
बदरीनाथ से निकलने का कोई रास्ता न देख अलकनंदा के किनारे-किनारे करीब ढाई हजार यात्री पैदल ही गोविंदघाट की ओर पिछले तीन दिनों से लगातार चले आ रहे हैं। इनमें से 90 प्रतिशत यात्री तो ऐसे हैं जो पहाड़ी रास्तों के बारे में कुछ जानते ही नहीं।
इनके लिए एक कदम भी आगे बढ़ाना, जैसे कई सौ किलोमीटर का सफर तय करने के बराबर है। फिर भी घुटनों के बल रेंगते हुए, कभी किसी का सहारा लेकर, कभी एक दूसरे का सहारा बनकर करीब 13 किलोमीटर तक का सफर तय करने के बाद अब लामबगड़ में फंस गए हैं।
खुले में रात बिताने को मजबूर
हाल यह है कि पिछले तीन दिनों से ये यात्री लामबगढ़ में उफनाई हुई अलकनंदा के किनारे खुले में रात बिताने को मजबूर हैं। शुक्रवार को इन्हें हेलीकाप्टर के जरिए करीब 35 पैकेट रसद मिली। यह कुछ के लिए पूरा हुआ और किसी के हाथ कुछ भी नहीं आया।
सेना के जवान यहां पर रस्सी के सहारे लोगों को नदी पार करवा रहे हैं कि वह भी करीब आधे घंटे में एक। ऐसे में नदी के उस तरफ बदरीनाथ से निकल कर पहुंचने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। वहीं सेना पुल बनाने की कोशिश में तो हैं पर सामान लामबगढ़ तक नहीं पहुंच पा रहा है।
गोविंदघाट से करीब दस किलोमीटर दूर लामबगड़ तक यह सामान सिर्फ ढोया ही जा सक ता है। अभी सामान गोविंदघाट पर ही है लिहाजा कम से कम दो दिन और पुल बनाने में लगेंगे।
राह आसान नहीं
जो निकल भी आए हैं उनकी राह कम आसान नहीं है। कई ऐसे भी हैं जो नदी पार कर पाए हैं पर उनके परिजन दूसरी तरफ ही रह गए। कोई महिला बच्चों के साथ तो हैं लेकिन उसे अपने पति का इंतजार है। किसी की बूढ़ी मां इस तरफ आ गई है पर बेटा उस तरफ रह गया है। किसी को अपने साथियों का इंतजार है।
इतना सब हो भी जाए तो आगे की घड़ी और मुश्किल भरी है। लामबगढ़ के पास ही करीब छह किलोमीटर की सड़क पूरी तरह से बह गई है। इस रास्ते को पार करने के लिए जंगल की खड़ी चढ़ाई है और टूटा-फूटा ऐसा रास्ता कि देखकर कलेजा मुंह को आ जाए।
बच्चों के साथ इस दस किलोमीटर की पैदल दूरी को तय करना किसी चुनौती से कम नहीं है। इस घटाटोप के बीच कई ऐसे क्षण भी आते हैं जो इन यात्रियों को कदम आगे बढ़ाने का हौसला देते हैं। टूटे हुए रास्तों को पार कराने की जिम्मेदारी सेना ने संभाल ली है और रस्सी डालकर खतरे को कुछ कम भी कर दिया है।
भंडारा लगाकर कर रहे मदद
जब हौसला टूटने की कगार पर होता है तो कोई न कोई हाथ आगे बढ़ ही जाता है। इसी के सहारे लोग बदरीनाथ से निकलकर किसी तरह गोविंदघाट तक पहुंच रहे हैं। पांडुकेश्वर के लोग खुद जख्म खाए हुए हैं पर भंडारा लगाकर मदद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। गोविंदघाट में भी रेत से दबा सामान निकालकर लंगर लगाया लगाया जा रहा है।