द्वाराहाट (अल्मोड़ा)। तहसील के सुदूरवर्ती ठोकर गांव निवासी युवक राधेश्याम सुरेवाल को दस्तकारी में महारत हासिल है। वह चीड़ के पेड़ की छाल (बगट) से बेहतरीन शोपीस बनाते हैं। राधेश्याम ने एक साल में 500 से अधिक शोपीस बनाए हैं। वह कहते हैं कि सरकार यदि इस विधा को संरक्षण दे तो स्वरोजगार के लिए यह मील का पत्थर साबित हो सकती है।
ग्राम ठोकर निवासी 35 वर्षीय राधेश्याम सुरेवाल को बचपन से ही हस्तशिल्प का शौक है। वह करीब 20 साल से बगट से कलाकृतियां बनाते हैं लेकिन, अब उन्हें इस क्षेत्र में महारत हासिल हो गई है। पिछले एक साल में उन्होंने बगट से हुक्का, नारी, शिवलिंग, नाव, कछुवा, एस्ट्रेवाट, कप, टेबल लैंप, गिटार, तिरंगा, होटल, धर, रथ आदि कलाकृतियां बनाई हैं।
इनका इस्तेमाल शोपीस के रूप में हो सकता है। 10वीं शिक्षा प्राप्त राधेश्वर के पिता जसराम राज मिस्त्री थे। पिता की विरासत को पुत्र आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि वह निकटवर्ती जंगल में जाकर बगट लाते हैं, इसके बाद इसे तरासकर शोपीस बनाते हैं। इसके बावजूदकहीं से भी कोई आर्थिक मदद नहीं मिली है।
कुछ माह पूर्व द्वाराहाट में हुए शिल्पकार सम्मेलन में उन्होंने शोपीस की जानकारी राज्यसभा सदस्य प्रदीप टम्टा को भी दी, उन्होंने इस बारे में सार्थक कार्रवाई का आश्वासन दिया था। उन्होंने बताया कि यदि सरकार दस्तकारी विधा को संरक्षण दे तो स्वरोजगार के रूप में यह विधा मील का पत्थर साबित हो सकती है।