बंदर, सुअरों के डर से खेती से विमुख हो रहे ग्रामीणों के लिए गगास घाटी के काश्तकार नजीर पेश कर रहे हैं। सब्जी उत्पादन के लिए मशहूर इस क्षेत्र में भी वन्य जीवों का खासा आतंक है, लेकिन महिलाओं ने हार मानने के बजाए आपस में बारी बारी से खेतों में पहरा देने का निर्णय लिया। अब खेतों में सब्जी उग रही हैं, सब्जियों को लेकर महिलाओं ने बाजार पहुंचना भी शुरू कर दिया है।
मालूम हो कि गगास घाटी से जुड़े चमना, मंगचौड़ा, बिष्ट कोटली, मौना, मकड़ों, मटेला, मनेला, दलमाड़, कोट्यूड़ा आदि क्षेत्रों में लाई, मेथी, पालक, बथुवा, चौलाई आदि हरी सब्जियों का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होता है। यहां के काश्तकारों की आजीविका का साधन ही सब्जी उत्पादन है। पिछले एक दशक से बंदर, सुअरों के आतंक के चलते सब्जियों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है, लेकिन ग्रामीणों ने बंदर, सुअरों के आतंक से खेती किसानी छोड़ने के बजाए, इसका मुकाबला करने का निर्णय लिया। सब्जी बेचने पहुंची पुष्पा देवी, विमला देवी, देवकी देवी आदि का कहना है कि बंदर, सुअरों ने जीना मुहाल कर दिया है, लेकिन महिलाएं दिन और रात अलग अलग पालियों में बारी-बारी से खेतों में पहरा देकर किसी तरह सब्जियों की रक्षा कर रही हैं।
महिलाओं की मेहनत के चलते गगास घाटी की सब्जियां अब बाजार पहुंचने लगी हैं। कुछ साल पहले तक इन गांवों की महिलाएं सर्दियों में तड़के चार बजे से खेतों में जाकर सब्जियां निकालती, इसके बाद सिर में हरी सब्जियों की डलिया सजाकर चार से पांच किमी की पैदल चढ़ाई पार कर रानीखेत पहुंचती थी, इसके बाद नगर की हर गलियों में लाई लेलो, पालक लेलो, मेथी लेलो की आवाजें गूंजती थीं, मोहल्लेवालों को भी सब्जी बेचने वाली महिलाओं का बेसब्री से इंतजार रहता था।