काव्य संगम की ओर से होली डे होम सभागार में हुई काव्य गोष्ठी में रचनाकारों ने कविता के माध्यम से बुराइयों पर कटाक्ष किया। वरिष्ठ कवयित्री दिवा भट्ट ने अपनी कविता जिस घर तक ले जाते थे वे रास्ते वह घर कहां गया, मुझे ढूंढो मेरे रास्तों में तुमसे बिछुड़ गई हूं..में पलायन के दर्द को उजागर किया।
तफज्जुल खान ने अंधेरे में अंधेरा के सिवा क्या मिलेगा, हालात से लड़ोगे तो सुनहरा सवेरा मिलेगा, मोती प्रसाद साहू ने सूर्योदय का बाट देखते जाग रहे थे कब से हम रात खा गई सपने सारे दिवास्वप्न हो गए मनोरथ, मनीष पंत ने तूने जहर भी जैसे शहद की तरह घोला है झूठ तो तोला है मगर क्या खूब बोला है, डा. निर्मल कुमार पंत प्रवाह ने चक्षु चंचल, चपल चित ढूंढते आवास किसमें, जाने संजो रही हो तुम, स्वप्न का आकाश किसमें कविता पेश की।
मनी नमन ने यूं कहा- जलता हुआ चिराग मेरे दर पे आ गया ये कौन मुसाफिर है जो शहर में आ गया।
इस मौके पर सुरेश पोखरिया, हेम जोशी, नीरज पंत, चंद्रा उप्रेती, डा. ललित जोशी योगी, कंचन तिवारी, प्रकाश उनियाल, जयप्रकाश जोशी, कैलाश बिनवाल, डा. रमेश लोहुमी, डा. तेजपाल सिंह, नवीन बिष्ट. डा. जेसी दुर्गापाल आदि ने काव्य पाठ किया। इस मौके पर कवि प्रकाश उनियाल का पहला काव्य संग्रह माटी की सुगंध का विमोचन भी किया गया।