जल निगम को राजकीय विभाग घोषित करने की मांग को लेकर पेयजल निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों ने धरना दिया। उन्होंने नारेबाजी कर विरोध जताया। तय हुआ कि जल्द मांग नहीं मानी गई तो 29 अक्तूबर को देहरादून में महा रैली होगी और इसके बाद निर्णायक आंदोलन शुरू किया जाएगा।
पेयजल निगम अधिकारी, कर्मचारी महासंघ के बैनर तले हुए कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि पेयजल निगम सरकार का सबसे पुराना विभाग है।
1975 के बाद विश्व बैंक से मिली धनराशि को व्यय करने के लिए सरकार ने विभाग को निगम बना दिया। योजनाओं से काटी जाने वाली 12.5 फीसदी धनराशि से ही निगम अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन आदि के भुगतान का प्रावधान है।
हाल के वर्षों में सरकार पेयजल योजनाओं का निमार्ण भी स्वजल, स्वयं सेवी संस्थाओं के साथ ही अन्य एजेंसियों से करा रही है। इससे अधिकारियों और कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है।
सेवानिवृत्त कार्मिकों को पेंशन का भुगतान भी नहीं हो रहा है। विभाग में पिछले दो महीने से वेतन भुगतान को बजट नहीं है।
उन्होंने कहा कि विभाग के राजकीयकरण को लेकर शासन में कई बार वार्ताएं हो चुकी हैं। सीएम रावत ने भी आश्वासन दिया है। इसके बावजूद यह प्रस्ताव कैबिनेट की बैठक में नहीं लाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
तय हुआ कि सभी अधिकारी, कर्मचारी प्रांतीय आह्वान पर 29 अक्तूबर को देहरादून में होने वाली महा रैली में भाग लेंगे।
धरने और सभा में अधिशासी अभियंता एन लाल, आरबी मौर्या, केडी भट्ट, एके त्यागी, बीके तिवारी, एनएस लोधियाल, वाईएस लसपाल, दीप चंद्र, अरविंद जोशी, दीपक चंद्र जोशी, एमएस नपलच्याल, उमा जोशी, रैना पांडे, दीपा जोशी, कमला चौधरी, निर्मला रावत, गीता, प्रेमा बिष्ट आदि शामिल थे।