विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (वीपीकेएएस) की विकसित वीएल सोया 89 और वीएल भट 202 किस्मों का रैलाकोट, दिगोटी और निरई गांव में प्रयोग सफल रहा है। वैज्ञानिकों के निरीक्षण के दौरान इन किस्मों में बेहतर उत्पादकता, दानों की गुणवत्ता और रोग सहनशीलता पाई गई है। इन दोनों की खेती से पहाड़ के किसानों की तकदीर बदल सकती है। वीपीकेएएस के वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई है। दरअसल जिले में अब तक किसान पारंपरिक सोयाबीन एवं भट की खेती ही किया करते थे। किसान इन फसलों को मडुवा के साथ लगाते थे जिस कारण उन्हें निराई, गुड़ाई आदि करने में काफी परेशानी होती थी। अब किसानों को इससे निजात मिलेगी।
इनकी खेती रैलाकोट, दिगोटी और निरई गांव में एकल फसल के रूप में की जा रही है। इन गांवों में करीब सात किसानों ने 10 नाली में वीएल सोया 89 और वीएल भट 202 की खेती की है। इन दोनों किस्मों की प्रजातियों की फसल से खेत लहरा रहे है।
वीएल सोया 89 में 23 से 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन की क्षमता है। इसके साथ ही वीएल भट 202 में 15 से 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन क्षमता है। दोनों प्रजातियों के फसलों की जून अंतिम सप्ताह में बुआई की जाती है जो अक्तूबर मध्य तक पककर तैयार हो जाती है।
संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम ने उपरोक्त गांवों का दौरा कर फसल की वृद्धि अवस्था, पोषण प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण तथा कीट एवं रोग प्रबंधन की स्थिति का मूल्यांकन किया। इस दौरान फसल का प्रदर्शन सर्वोत्तम पाया गया। संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक वीएल सोया 89 और वीएल भट 202 प्रजातियां इसलिए भी खास हैं कि किसान इन फसलों की एकल खेती कर सकते हैं। इन फसलों को अन्य फसलों के सहारे की जरूरत नहीं पड़ती है। इससे किसानों को दोहरा फायदा होता है। एक तो उन्हें निराई गुडाई में आसानी होती है दूसरा फसल की फलियां भी गिरती नहीं है। पहाड़ की जलवायु के लिए भट की यह प्रजाति मुफीद है।
फसल की कीट रोग प्रतिरोधक क्षमता है मजबूत
वीएल सोया 89 और वीएल भट 202 प्रजाति की फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी मजबूत है। आम तौर पर पारंपरिक सोयाबीन और भट्ट में जहां कीट लग जाने से फसल को नुकसान पहुंचता है वहीं भट की उपरोक्त दोनों प्रजातियों में कीट लगने की संभावना कम रहती है। फसल में कीट लगने से जहां किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है वहीं भट की उपरोक्त प्रजातियां किसानों के लिए फायदेमंद है।
किसान बोले
वीएल सोया 89 और वीएल भट 202 की पहली बार खेती कर रहे हैं। फसल पकने के करीब है। उम्मीद है कि पहली फसल से बेहतर उत्पादन होगा। किसानों के लिए ये फसल लाभकारी होगी।
- भावना जीना, रैलाकोट गांव
वीएल सोया और भट की पंक्तिवार बुआई की थी। खेतों में फसल अच्छी हुई है। फलियों को देखकर उम्मीद लगाई है कि उत्पादन बंपर होगा। इस फसल के उत्पादन से किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आएगा।
- लक्ष्मी जीना, रैलाकोट गांव
पारंपरिक भट और सोयाबीन की खेती मडुवा के साथ करते थे। निराई, गुड़ाई में काफी दिक्कतें होती थी। खतपतवार भी परेशानी बढ़ाती थी। वीएल सोया 89 और 202 की एकल फसल के रूप में खेती की है। इससे निराई गुडाई में आसानी हो रही है।
- आशा देवी, रैलाकोट गांव
वैज्ञानिकों की टीम ने रैलाकोट, दिगोटी और निरई गांव में वीएल सोया 89, वीएल भट 202 किस्मों के प्रदर्शन का जायजा लिया। इन किस्मों में बेहतर उत्पादकता, दानों की गुणवत्ता एवं रोग सहनशीलता देखी गई। इन प्रजातियों का उपरोक्त गांव में प्रयोग सफल रहा है। भट और सोयाबीन जैसी पौष्टिक एवं पारंपरिक फसलों के वैज्ञानिक प्रबंधन से पहाड़ के किसानों की आर्थिकी में सुधार आएगा।
- डॉ. लक्ष्मी कांत निदेशक, वीपीकेएएस अल्मोड़ा
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