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वंदना ने पिरूल और घिंघारू से बनाई ईको फ्रेंडली राखियां

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अल्मोड़ा। रक्षाबंधन पर्व पर हर साल बाजार में चीन निर्मित राखियों का बोलबाला रहता था। रक्षाबंधन भारतीयों का होता है और चांदी चीन की होती थी। गलवन घाटी में भारतीय सेना के साथ झड़प में जवानों के शहीद होने के बाद लोकल फॉर वोकल की मुहिम में तेजी आई है। इस बार जहां बाजार से चीन की राखियां गायब हैं वहीं बच्चे भी अब स्वदेशी चीजों का महत्व समझ रहे हैं। इसी का नतीजा है कि राजकीय उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय चमुवां की छात्रा वंदना कार्की ने ईको फ्रेंडली राखियां बना डालीं। इस बार भाइयों की कलाई पर वंदना की ईको फ्रेंडली राखियां सजेंगी।
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वंदना कार्की धौलादेवी विकासखंड के अंतर्गत राजकीय उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय चमुवां में कक्षा नौ की छात्रा हैं। कोरोना महामारी और सीमा पर चीन से तनातनी के चलते वंदना ने स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने की ठान ली। उन्होंने रक्षाबंधन पर्व पर भाइयों को ईको फ्रेंडली राखियों का तोहफा दिया है। वंदना ने पिरूल और
घिंघारु की सुंदर राखियां बनाई हैं। वंदना ने बताया कि विद्यालय में उनकी शिक्षिका प्रेमा गड़कोटी के मार्गदर्शन में स्कूल के बच्चों ने हर त्योहार पर कुछ न कुछ नया सीखा है। इस बार भी घर बैठे कुछ नया करने का विचार आया। पहाड़ के गांवों में पिरुल और घिंघारू बहुतायत मात्रा में होता है लेकिन इसका सही उपयोग नहीं हो पाता है। सोचा क्यों न इससे राखियां बना लीं जाएं। इन दिनों विद्यालय बंद हैं। घर में पढ़ाई से इतर वह राखियां बना रही हैं। वंदना ने बताया कि इन राखियों को गांव और आसपास के इलाके में बांटेंगी ताकि हर भाई की कलाई ईको फ्रेंडली राखियों से सजे। वंदना ने बताया कि मार्गदर्शक शिक्षिका प्रेमा गड़कोटी का हमेशा सहयोग मिलता है। वह रचनात्मक कार्य के लिए प्रेरित करती हैं।
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