1940 के दशक में प्रख्यात नर्तक पंडित उदयशंकर ने अल्मोड़ा में कई साल रामलीला मंचन किया। उदयशंकर और उनके कलाकारों की टीम द्वारा प्रस्तुत रामलीला का मंचन अद्भुत होता था।
छाया चित्र के जरिए दिखाई जाने वाली इस रामलीला का चित्रण इतना सजीव होता था कि उस दौर में रामलीला देख चुके लोगों को तमाम दृश्य आज भी याद हैं।
सीता हरण के प्रसंग में रावण द्वारा सीता को आकाश मार्ग से ले जाने का दृश्य इतना सजीव होता था कि मानो रावण आकाश मार्ग से ही निकल रहा हो।
पंडित उदयशंकर द्वारा प्रस्तुत की गई रामलीला की छाप आज भी कुमाऊं की रामलीला में दिखाई पड़ती है। प्रख्यात नर्तक उदयशंकर चालीस के दशक में कलाकारों की टीम के साथ अल्मोड़ा के पातालदेवी में रहे।
यहीं से वह देश-विदेश में शो करने भी जाया करते थे। इस दौरान उन्होंने अल्मोड़ा में पांच-छह साल रामलीला का मंचन किया। उनकी टीम में उनके भाई प्रख्यात तबला वादक रविशंकर, उस्ताद अलाउद्दीन, गुरुदत्त, अमला शंकर सहित तमाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कलाकार होते थे।
इसलिए पंडित उदयशंकर और उनके साथी कलाकारों द्वारा छाया चित्र के जरिए प्रस्तुत रामलीला का प्रस्तुतीकरण अंतर्राष्ट्रीय स्तर का होता था। रामलीला का मंचन पर्दे के पीछे से होता था, लेकिन सभी कलाकार पूरी तरह मेकअप में हुआ करते थे और छाया चित्र में दृश्य इतना साफ और खूबसूरत होता था कि इस रामलीला को देखने हजारों की भीड़ एकत्र होती थी।
पातालदेवी की पहाड़ी में खुले में मंच बनता था और इस पर विशाल सफेद पर्दे लगाए जाते थे। सामने की तरफ की रिज में दर्शक बैठा करते थे। उस दौर में बिजली नहीं थी, लेकिन उदयशंकर की कंपनी के पास अपना जनरेटर हुआ करता था। प्रोजेक्टर के जरिए इस रामलीला का प्रदर्शन हुआ करता था। बैकग्राउंड से म्यूजिक और डायलाग चलते रहते थे।
81 वर्षीय वरिष्ठ रंगकर्मी शिवचरण पांडे हर बार इस रामलीला को देखने जाते थे। वह बताते हैं कि इस रामलीला में खासतौर पर धनुष भंजन, लंका दहन, राम-रावण युद्ध, सुलोचना सती और सीता हरण आदि दृश्यों का चित्रण इतना प्रभावशाली होता था कि उनकी रामलीला देख चुके लोगों के जेहन में वह दृश्य आज भी अमिट हैं।
तीन दिन की रामलीला के दौरान कभी पंडित उदयशंकर का नृत्य भी होता था। श्री पांडे बताते हैं कि जब उदयशंकर नृत्य करते थे तो ऐसा लगता था कि उनके शरीर से किरणों का पुंज निकल रहा हो। उन्हें देखकर लगता था कि जैसे उन्हें ईश्वर की शक्ति प्राप्त हो।
उदयशंकर की रामलीला की छाप आज भी कुमाऊंनी रामलीला में दिखाई पड़ती है। आज भी कई स्थानों पर रामलीला में लंका दहन, सीता हरण आदि दृश्यों का मंचन छाया चित्र के माध्यम से किया जाता है। जो बहुत खास लगता है।