थराली और धराली में आई आपदा के बाद से पहाड़ी क्षेत्रों में संभावित खतरों को देखते हुए उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) और अल्मोड़ा जिला प्रशासन की ओर से अल्मोड़ा का विस्तृत भूगर्भीय सर्वेक्षण शुरू किया है। वैज्ञानिक दल जिले की धरातलीय परिस्थितियों, नदियों के आसपास बसे क्षेत्रों और भूस्खलन प्रभावित स्थानों का वैज्ञानिक अध्ययन कर रहा है। प्रदेश में इस विशेष अध्ययन के लिए अल्मोड़ा जनपद का चयन किया गया है।
इस परियोजना के समन्वयक एवं यूकॉस्ट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ नवीन चन्द्र जोशी ने बताया कि यह परियोजना नेपाल में आई त्रासदी के बाद और महत्वपूर्ण हो गई है। परियोजना के पहले चरण में रामगंगा और कोसी नदी समेत उनकी सहायक नदियों के किनारे बने भवनों और अन्य संरचनाओं की जीआईएस तकनीक के माध्यम से जियो टैगिंग की जा चुकी है। इन भवनों और संरचनाओं को रिसेंट फ्लड प्लेन (आरएफपी) और टी-1 जोन के आधार पर चिह्नित किया गया है। उन्होंने बताया कि कोसी और उसकी सहायक नदियों के किनारे शुरूआत में कुल 456 संरचनाओं को चिन्हित किया गया है तथा रामगंगा एवं उसकी सहायक नदियों के किनारे 801 संरचनाओं को जिओ टैग किया गया है। उन्होंने बताया कि परियोजना के दूसरे चरण में वैज्ञानिक दल धरातल पर जाकर ग्राउंड ट्रूथिंग करेगा एवं ऐसे भवनों और क्षेत्रों को चिन्हीकरण करेगा, जो जीआईएस तकनीक के माध्यम से संभावित खतरे वाले जोन में पाए गए हैं। इसके साथ ही नदियों के किनारे बसे मानव बस्तियों के लिए जोखिम का भी आकलन किया जाएगा।
यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो दुर्गेश पंत ने कहा कि अल्मोड़ा जिले के सफल अध्ययन के बाद यह अध्ययन पूरे उत्तराखंड में किया जाएगा। भविष्य में उत्तराखंड को नेपाल जैसी त्रासदी का सामना न करना पड़े इसके लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। यूकॉस्ट की ओर से इस प्रकार के अध्ययनों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
रामगंगा किनारे 801 संरचनाएं पुराने बाढ़ मैदान में
नदियों के किनारे निर्माण पर नजर रखने की जरूरत
अध्ययन में गगास नदी के आरएफपी क्षेत्र में 40 और साई नदी के आरएफपी क्षेत्र में 11 संरचनाएं भी दर्ज की गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये आंकड़े सक्रिय नदी चैनलों और बाढ़ मैदानों के नजदीक बसी आबादी एवं बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता को सामने रखते हैं।
भूस्खलन के कारणों की होगी जांच
खतरे से पहले मिलेगा अलर्ट
सर्वेक्षण के बाद तैयार विस्तृत रिपोर्ट जिला प्रशासन को सौंपी जाएगी। संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की योजना है। यानी भविष्य में पहाड़ खिसकने या अन्य प्राकृतिक खतरे की आशंका होने पर लोगों को समय रहते चेतावनी मिल सकेगी। परियोजना के तहत तैयार मानचित्र और स्थानीय डाटाबेस का उपयोग संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों के नियमन, जल निकासी व्यवस्था में सुधार, नदी कटाव वाले क्षेत्रों की निगरानी और आपदा प्रबंधन की रणनीति तैयार करने में किया जा सकेगा।