अल्मोड़ा/सोमेश्वर। पर्वतीय क्षेत्र के घाटी वाले इलाकों में पहले जहां हुड़कियाबौल की थाप पर धान की रोपाई होती थी। वहीं अब हुड़कियाबौल के साथ धान की रोपाई की परंपरा विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। इस परंपरा के अंतर्गत लोक कलाकार हुड़के की थाप में लोकगाथाएं सुनाता है और ग्रामीण महिलाएं मनोरंजन के साथ ही धान की रोपाई करती हैं। इसमें रोपाई के कार्य के साथ ही उनका मनोरंजन भी होता था जिससे थकान भी कम लगती थी।
जिले की सोमेश्वर, बौरारो, बमनस्वाल, सरयू, पनार, गेवाड़ घाटी सहित अन्य घाटी क्षेत्रों में धान की पैदावार काश्तकारों की आजीविका का प्रमुख साधन है। खरीफ के सीजन में नौकरी पेशा लोग भी छुट्टी लेकर धान की रोपाई करने घर पहुंचते हैं। बारिश के बाद धान की रोपाई में तेजी आती है।
पूर्व तक घाटी क्षेत्रों में जगह-जगह हुड़कियाबौल लगाकर धान की रोपाई की जाती थी। इस परंपरा में एक लोक कलाकार हुड़का बजाते हुए लोक गाथाएं आदि का वर्णन करता था। लोक गाथाएं सुनते हुए रोपाई करने वाली महिलाओं को थकान का आभास भी नहीं होता था।
चनौदा, कौसानी, सोमेश्वर, भूलखर्कवालगांव, रैत, अधूरिया, खाड़ी सुनार, जालधौलाड़, लोद, झुपुलचौरा, सिरखेत, नाखेत, तालखेत, पल्यूडख़ेत आदि इलाकों में धान की रोपाई शुरू हो गई है। बारिश होने पर इसमें तेजी आएगी, लेकिन पिछले चार सालों से हुड़कियाबौल की परंपरा इन क्षेत्रों में कम ही दिखाई देती है। कतिपय स्थानों को छोड़कर हुड़कियाबौल का आयोजन विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गया है।
सोमेश्वर। माला गांव निवासी 58 वर्षीय लोक कलाकार हरी राम कहते हैं कि पूर्व में कई लोग धान की रोपाई के समय हुड़कियाबौल लगाने के लिए बुलाते थे। हुड़कियाबौल की परंपरा पहाड़ की खेती और यहां की संस्कृति से जुड़ी है, लेकिन पिछले तीन चार सालों से अब उन्हें कोई नहीं बुला रहा है। विलुप्त हो रही इस विधा को बचाने के लिए सरकार और समाज के जागरूक लोगों को कदम उठाने चाहिए।