अल्मोड़ा। प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने प्रकृति के सारे रूपों को अपने काव्य में उकेरा है। प्रकृति का जैसा चित्रण उनके काव्य में मिलता है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। सात साल की आयु में ही उन्हें काव्य पाठ पर पुरस्कार मिला था। उनकी रचनाएं कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा समेत विभिन्न विश्वविद्यालयों के बीए, एमए (हिंदी) के अलावा स्कूली पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जाती हैं।
सुमित्रानंदन पंत का जन्म कौसानी में चाय बागान के व्यवस्थापक पंडित गंगा दत्त पंत के घर 20 मई 1900 में हुआ। उनके जन्म के करीब छह घंटे बाद ही उनकी माता सरस्वती देवी का निधन हो गया। मातृ स्नेह से वंचित सुमित्रानंदन पंत के काव्य में मां की पुनीत स्मृति बिखरी हुई मिलती है। माता के निधन के बाद शिशु सुमित्रानंदन पंत की दीर्घायु की मनौती मांगते हुए उनके पिता गंगा दत्त पंत ने उन्हें एक गोस्वामी हरगिरि बाबा को सौंप दिया। बाबा हरगिरि ने उनका नाम गुसाई दत्त पंत रख दिया। प्रारंभिक शिक्षा कौसानी के वर्नाक्यूलर स्कूल में होने के बाद वह चौथी कक्षा में प्रवेश के लिए अल्मोड़ा आए। विलक्षण प्रतिभा के धनी सुमित्रानंदन पंत को नौ साल की आयु में अमरकोश, मेघदूत, चाणक्य नीति आदि ग्रंथों के अनेक श्लोकों का ज्ञान हो गया था। 1916 में अल्मोड़ा अखबार में उनकी पहली कविता छपी। 1918 में जीआईसी अल्मोड़ा से नवीं कक्षा पास करने के बाद आगे की शिक्षा के लिए उन्हें बनारस भेजा गया।
सुमित्रानंदन पंत ने छायावाद, प्रगतिवाद और नव चेतनावाद की तीन प्रमुख धाराओं के अंतर्गत साहित्यिक रचनाएं लिखीं। 1960 में कला और बूढ़ा चांद की रचना में उन्हें साहित्य अकादमी और 1969 में चिदंबरा पर भारतीय ज्ञान पीठ पुरस्कार मिला। उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। 28 दिसंबर 1977 को इलाहाबाद में उनका निधन हो गया। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के हिंदी विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर जगत सिंह बिष्ट का कहना है कि सुमित्रानंदन पंत के काव्य में प्रकृति के सारे रूप देखने को मिलते हैं। उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं। साहित्य जगत में उन्हें छायावाद का आधार स्तंभ माना जाता है।
वीथिका में सुरक्षित रखी हैं पंत के कविता संग्रह की पांडुलिपियां
अल्मोड़ा। राजकीय संग्रहालय अल्मोड़ा के अधीन कौसानी में उनके पैतृक घर पर सुमित्रानंदन पंत वीथिका स्थापित की गई। वीथिका में कविवर पंत को मिले सम्मान पत्र, उनकी जन्म कुंडली, उनके जीवन से जुड़े छाया चित्र, उनके द्वारा प्रयोग की गई कुर्सी, मेज, चश्मा, अटैची, चादर आदि सामान रखा गया है। साथ ही उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्ति पत्र, हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्ति पत्र भी यहां मौजूद है। कविवर पंत की रचनाएं लोकायतन, आस्था आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हैं।