श्री कल्याणिका हिमालय देवस्थानम कनरा डोल आश्रम में संत मोरारी बापू ने अपने विशिष्ट अंदाज में रामकथा का रसास्वादन कराया। मुरारी बापू ने रामचरित मानस को इतना सरल, सहज तरीके से प्रस्तुत किया कि श्रोताओं की आंखें नम हो गईं। उन्होंने रामकथा के जरिए लोगों को सद्कार्यों के लिए प्रेरित किया। युवाओं ने भी पूरा समय राम कथा को ध्यान से सुना।
संत मुरारी बापू ने शनिवार को मानस श्री की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि रामचरित मानस में श्री की महिमा गाई गई है। श्री तत्व का दर्शन भिन्न-भिन्न रूप में किया जा सकता है। सुंदरकांड में भी श्री की महिमा भरी है जो रामदूत हनुमान को मालामाल कर देती है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की असीम अनुकंपा से उन्हें देवभूमि उत्तराखंड आने का सौभाग्य मिला है।
उन्होंने डोल आश्रम के बाबा कल्याणदास का आभार जताया कि उन्हें रामकथा सुनाने के लिए सालम की पावन भूमि में आमंत्रित किया। रविवार 22 अप्रैल से सुबह दस से दिन के 1.30 बजे तक रामकथा होगी। रामकथा सुनने के लिए काफी दूर-दूर से बुजुर्ग, बच्चे तथा युवा पहुंचे हुए थे। इससे पूर्व संत मुरारी बापू के डोल आश्रम पहुंचने पर आश्रम के लोगों ने उनका आतिथ्य सत्कार किया।
स्वागत करने वालों में बाबा कल्याणदास, महामंडेलश्वर हरिचेतना नंद, हंस राम, देवाचार्य श्याम दास, श्री महंत आत्मा राम, स्वामी निगुर्ण दास, स्वामी विश्वेस्वरानंद आदि शामिल हैं।
संत सम्मेलन की तैयारियां जोरों पर
डोल आश्रम लमगड़ा में संत सम्मेलन की तैयारियां जोरों पर चल रही है। संत सम्मेलन 26 से 28 अप्रैल तक होगा। डोल आश्रम में विभिन्न क्षेत्रों से संतों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है। अब तक कई संत आश्रम में पहुंच चुके है। एक दो दिन में काफी संख्या में संतों के पहुंचने की उम्मीद है।
बापू ने 14 साल की उम्र में एक महीने तक रामकथा सुनाई
मुरारी बापू का जन्म 1946 में 25 सितंबर के दिन महुआ के समीप तलगारजा (सौराष्ट्र) में वैष्णव परिवार में हुआ था। उनके दादाजी त्रिभुवनदास का रामायण के प्रति असीम प्रेम था। बापू विद्यार्जन को तलगारजा से महुआ पांच किमी पैदल जाते थे। उन्हें दादाजी द्वारा सनाई गई रामायण की पांच चौपाइयां प्रतिदिन याद करनी पड़ती थीं।
धीरे-धीरे उन्हें समूची रामायण कंठस्थ हो गई। बापू ने दादाजी को ही अपना गुरु मान लिया। मात्र 14 साल की उम्र में बापू ने पहली बार तलगारजा में चैत्रमास 1960 में एक महीने तक रामायण कथा का पाठ किया। छात्र जीवन में उनका मन पढ़ाई में कम रामकथा में अधिक रमने लगा था। बाद में वह महुआ के उसी प्राथमिक स्कूल में शिक्षक बने जहां वह विद्यार्जन किया करते थे। रामायण के प्रति प्रेम अधिक होने के कारण उन्होंने शिक्षण कार्य छोड़ दिया।