पहाड़ में बांज और अन्य चौड़ी पत्ती के वनों की जगह चीड़ के वन तेजी से फैल रहे हैं। चीड़ के जंगलों में बारिश का पानी धरती के भीतर काफी कम मात्रा में जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक बांज के वनों में बारिश का लगभग 23 प्रतिशत पानी धरती के भीतर जाता है, लेकिन चीड़ के वनों में सिर्फ आठ प्रतिशत पानी ही भीतर जाता है और ज्यादातर पानी बहकर निकल जाता है। वहीं गर्मियों के मौसम में चीड़ के पेड़ों से गिरने वाला पिरूल एक तरह से बारूद का काम करता है और वनाग्नि से भारी नुकसान होता है। इसलिए चीड़ के वनों में चौड़ी पत्ती वाले पौधे लगाकर इन्हें समृद्ध बनाया जाना चाहिए।
वन विभाग से मिले आंकड़ों के मुताबिक सिविल सोयम वन प्रभाग अल्मोड़ा में ही 81.43 प्रतिशत चीड़ के वन हैं। जबकि बांज के वन सिर्फ 2.04 प्रतिशत और देवदार 1.34 प्रतिशत क्षेत्र में हैं। बता दें कि जल स्रोतों और नदियों में बहने वाले पानी का स्तर मुख्य तौर पर बारिश के जल के रिचार्ज पर निर्भर करता है। बारिश का जो भी पानी धरती के भीतर जाता है वही बाद में जल स्रोतों, नौलों और गधेरों से बाहर निकलता है। रिचार्ज की इसी प्रक्रिया पर नदियों का भविष्य भी टिका है लेकिन हाल के वर्षों में पहाड़ में धरती के भीतर के जल भंडारों में पानी का स्तर लगातार नीचे गिर रहा है। मुख्य नदियों की तमाम सहायक नदियां तेजी से सूख रही हैं।
बांज के वनों में ह्यूमस की परत सोखती है बारिश का पानी
अल्मोड़ा। कुमाऊं विवि एसएसजे परिसर में भूगोल विभाग के अंतर्गत एनआरडीएमएस केंद्र के एक अध्ययन के मुताबिक बांज के वन में ताजी पत्तियों से लेकर सड़ी-गली पत्तियों की 50 सेमी से लेकर एक मीटर तक मोटी परत जम जाती है। ह्यूमस कही जानी वाली यह परत बारिश के पानी को तेजी से सोखती है। यही वजह है कि बांज के वनों में बारिश का 23 प्रतिशत पानी धरती के भीतर जाता है।
बंजर भूमि क्षेत्र में रिचार्ज की दर सबसे कम
अल्मोड़ा। एनआरडीएमएस के निदेशक प्रो.जेएस रावत के मुताबिक चीड़ के वनों में बारिश के पानी का रिचार्ज सिर्फ आठ प्रतिशत ही होता है। दूसरी तरफ बंजर भूमि में जहां चीड़ के पेड़ भी नहीं हैं वहां सिर्फ पांच प्रतिशत पानी ही रिचार्ज होता है। डॉ. रावत का कहना है कि चीड़ के वनों में सुधार के लिए सबसे पहले वहां खाली भूमि में नेपियर घास के साथ ही घिंघारु, हिशालु, किल्मोड़ा आदि का रोपण करने की योजना बनाने के साथ ही वहां धीरे-धीरे चौड़ी पत्ती वाले बांज, बुरांश, काफल आदि प्रजाति के पौधे रोपे जाने चाहिए।