अल्मोड़ा। उत्तराखंड के राजकीय पुष्प ब्रह्मकमल पर जलवायु परिवर्तन का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के शोध में सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित दोहन और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण ब्रह्मकमल का प्राकृतिक आवास लगातार सिमट रहा है। शोध के अनुसार भविष्य में इसका उपयुक्त आवास और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक सकता है। ऐसे में राज्य पुष्प का अस्तित्व संकट में है।
एसएसजे विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के अध्ययन में सामने आया कि वर्तमान में उत्तराखंड में केवल 1,373 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही ब्रह्मकमल के लिए उपयुक्त बचा है जबकि 5,131 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मध्यम और 6,120 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कम उपयुक्त श्रेणी में है। वैज्ञानिकों ने भविष्य के जलवायु परिदृश्यों में कई क्षेत्रों में इसके प्राकृतिक आवास में कमी और ऊंचाई की ओर स्थानांतरण की आशंका जताई।
ऐसे हुआ शोध
- शोधार्थियों ने मैक्सएंट तकनीक से पूरे उत्तराखंड में पहली बार ब्रह्मकमल के वर्तमान और भविष्य के संभावित आवास का वैज्ञानिक अध्ययन किया। उन्होंने उत्तराखंड के 38 स्थानों से प्राप्त आंकड़ों और 26 पर्यावरणीय मानकों का विश्लेषण किया गया। मैक्सएंट मॉडल की सटीकता 93.5 प्रतिशत रही। यह शोध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका जर्नल फॉर नेचर कंजर्वेशन में प्रकाशित हुआ है।
ये हैं मुख्य कारक
- शोध में जैव-जलवायु, स्थलाकृतिक और मृदा संबंधी मानकों का विश्लेषण किया। अध्ययन में समतापीयता, औसत दैनिक तापमान अंतर, वार्षिक तापमान सीमा, सबसे गर्म तिमाही की वर्षा और ढाल की दिशा को ब्रह्मकमल के विकास को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले कारक पाया गया।
चेतावनी दी
जलवायु परिवर्तन से प्राकृतिक आवास तेजी से बदल रहे हैं।
अनियंत्रित दोहन और धार्मिक उपयोग से जंगली आबादी पर दबाव बढ़ रहा है।
भविष्य में ब्रह्मकमल का आवास अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक सकता है।
वैज्ञानिक संरक्षण और पुनर्स्थापन के बिना इस दुर्लभ प्रजाति का अस्तित्व और अधिक संकट में पड़ सकता है।
शोध में रहे शामिल
- इस शोध में गौरव देवतल्ला, प्रवीण गुणवंत, प्रो. अनिल कुमार यादव, डॉ. मनीष त्रिपाठी शामिल रहे।
अलग-अलग परिदृश्यों में ब्रह्मकमल के भविष्य के आवास का अनुमान
अवधि
जलवायु परिदृश्य
भविष्य में संभावित उपयुक्त आवास (वर्ग किमी)
शुद्ध बदलाव
औसत ऊंचाई में बदलाव
2021–2040
मध्यम उत्सर्जन (BCC-CSM2)
9,666
+27.23%
+267 मीटर
2041–2060
मध्यम उत्सर्जन (BCC-CSM2)
8,008
+5.39%
+884 मीटर
2021–2040
उच्च उत्सर्जन (BCC-CSM2)
12,249
+61.22%
+215 मीटर
2041–2060
उच्च उत्सर्जन (BCC-CSM2)
12,249
+61.22%
+215 मीटर
2021–2040
मध्यम उत्सर्जन (MIROC-6)
9,077
+19.46%
+432 मीटर
2041–2060
मध्यम उत्सर्जन (MIROC-6)
9,696
+27.62%
+376 मीटर
2021–2040
उच्च उत्सर्जन (MIROC-6)
9,197
+21.04%
+327 मीटर
2041–2060
उच्च उत्सर्जन (MIROC-6)
8,844
+16.40%
+192 मीटर
नोट:
मध्यम उत्सर्जन = SSP2-4.5 (ग्रीनहाउस गैसों का मध्यम स्तर)।
उच्च उत्सर्जन = SSP5-8.5 (ग्रीनहाउस गैसों का अधिक स्तर)।
BCC-CSM2 और MIROC-6 भविष्य की जलवायु का अनुमान लगाने वाले वैश्विक जलवायु मॉडल हैं।
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कोट
- अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ब्रह्मकमल का प्राकृतिक आवास लगातार बदल रहा है। यदि संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते वैज्ञानिक संरक्षण और पुनर्स्थापन नहीं किया गया तो भविष्य में इसके अस्तित्व पर गंभीर संकट पैदा हो सकता है। — गौरव देवतल्ला, शोधार्थी, वानिकी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग, एसएसजे विश्वविद्यालय अल्मोड़ा
कोट
- हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील है। इस शोध से स्पष्ट है कि अगर ब्रह्मकमल जैसी दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण नहीं हुआ तो इसका प्राकृतिक विस्तार लगातार प्रभावित होता रहेगा। — प्रो. अनिल कुमार यादव, विभागाध्यक्ष, वानिकी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग, एसएसजे विश्वविद्यालय अल्मोड़ा