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सबसे पहले जागेश्वर से ही शुरू हुआ लिंग पूजन

Thu, 23 Jul 2015 12:55 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो/अल्मोड़ा।
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अल्मोड़ा से 38 किमी दूर देवदार के घने वनों के बीच स्थित जागेश्वर धाम उत्तर भारत के एक प्रमुख शिव मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित है।
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मान्यता है कि यहां शिव जागृत रूप में विद्यमान हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले शिवलिंग का पूजन जागेश्वर से ही प्रारंभ हुआ। यह मंदिर प्राचीन कैलाश मानसरोवर मार्ग में स्थित है।

प्राचीन काल से ही यह स्थान काफी प्रसिद्ध रहा है। इसी कारण मानसरोवर यात्री यहां पूजा-अर्चना करने के बाद आगे बढ़ते थे।

अल्मोड़ा से 38 किमी दूर देवदार के घने वनों के बीच स्थित जागेश्वर धाम का प्राचीन काल से ही काफी महत्व है। पुराणों में भी इस स्थान का व्यापक वर्णन मिलता है।
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मान्यता है कि यहां शिव जागृत रूप में विद्यमान हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले शिव लिंग का पूजन जागेश्वर से ही प्रारंभ हुआ।

पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि भगवान शिव जागेश्वर के निकट दंडेश्वर में तपस्या कर रहे थे। इसी बीच सप्तऋषियों की पत्नियां वहां पहुंची और शिव के दिगंबर रूप में मोहित होकर मूर्छित हो गई।

सप्तऋषि उनकी खोज में वहां पहुंचे तो उन्होंने नाराज होकर भगवान शिव को पहचाने बगैर लिंग पतन का श्राप दे दिया। जिससे पूरे ब्रह्माण्ड में उथल पुथल मच गई।

बाद में सभी देवताओं ने किसी तरह शिव को मनाया और जागेश्वर में उनके लिंग की स्थापना की गई। मान्यता है कि तभी से शिव लिंग की पूजा शुरू हुई।

जागेश्वर धाम में मंदिरों का निर्माण और पुर्नउध्दार सातवीं से सत्रहवीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। जानकारी के मुताबिक जागेश्वर मंदिर का निर्माण कत्यूरी राजा शालीमार ने करवाया।
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जागेश्वर मंदिर नागर शैली का है। यहां स्थापित मंदिरों की विशेषता यह है कि इनके शिखर में लकड़ी का बिजौरा (छत्र) बना है। जागेश्वर लकुलीश संप्रदाय का भी प्रमुख केंद्र रहा। लकुलीश संप्रदाय को शिव के 28वें अवतार के रूप में माना जाता है।  

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