पुराणों में होली मनाने का विधान बताया गया है। गर्ग संहिता में भगवान कृष्ण के होली खेलने का सुंदर वर्णन है। इसमें श्रीकृष्ण को रंगोत्सव का नायक और राधा को नायिका माना गया है। जबकि भविष्येत्तर पुराण के अनुसार ढुंढा राक्षसी के उपद्रव को शांत करने के लिए होली को इस रूप में मनाया जाता है।
गर्ग संहिता में भगवान कृष्ण के होली खेलने का सुंदर वर्णन है। जब राधा के नेतृत्व में गोप कन्याओं ने धरती और आकाश को रंगों से भर दिया। गोप बालाएं श्रीकृष्ण को घेरकर उनके मुख को लेप अबीर, गुलाल बरसाकर रंग भरी पिचकारियों से खूब भिगो देती हैं। श्रीकृष्ण को रंगोत्सव का नायक और राधा को नायिका माना गया है।
होली की दूसरी कथा के अनुसार ढुंढा राक्षसी का उपद्रव शांत करने के लिए होली जलाई जाती है। भविष्येत्तर पुराण में होली मनाने का विधान दिया गया है। इसमें कहा गया है कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के अवसर पर लोग रंग बिरंगे वस्त्र पहनकर आनंद मनाते हुए अबीर गुलाल हवा में बिखेर कर नृत्य संगीत में मग्न होकर हास्य विनोद करते हैं।
इसमें कहा गया है कि इस दिन युवतियां नृत्य करती हैं और जल यंत्र लेकर एक दूसरे को रंग से सराबोर करते हुए शोर मचाना चाहिए जिससे राक्षसी के उपद्रव का नाश होता है।
भारतीय परंपरा में होली मनाने को लेकर यह कथा लोकप्रिय है। होलिका उग्र प्रकृति वाले दैत्य राज हिरण्य कश्यप की बहन थी। दैत्य राज का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था। दैत्य राज के आदेश पर जब प्रहलाद ने विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी तो उसने अपनी बहन होलिका को उसे मारने का आदेश दिया। दैत्य कन्या होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान था इसलिए उसने अग्नि प्रज्जवलित करके प्रहलाद के साथ आग में कूद लगा दी। पर चमत्कार ऐसा हुआ कि होलिका आग की चपेट में आ गई और प्रहलाद बच गया। मान्यता है कि तभी से होलिका दहन की परंपरा शुरूहुई।