जिले को लेकर एक बार फिर लोगों के हाथ मायूसी लगी। शनिवार को संपन्न कैबिनेट बैठक में नए जिलों की घोषणा होने की उम्मीद थी, लोग देर रात तक टीवी के आगे बैठे रहे, लेकिन जिलों को लेकर चर्चा तक नहीं हुई। रानीखेत जिले की मांग आजादी के बाद से ही चली आ रही है। 1955 में सबसे पहले जिले के लिए आंदोलन हुआ, लेकिन हर बार झूठे आश्वासनों के माध्यम से लोग छले गए हैं। पांच साल पहले जिले की घोषणा तो हुई, लेकिन गजट नोटिफिकेशन नहीं हो सका।
1869 से लेकर 1947 तक रानीखेत ब्रिटिश शासन का महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र रहा। यहां आईसीएस और आईएएस अधिकारी परगना मजिस्ट्रेट, सहायक आयुक्त और संयुक्त मजिस्ट्रेट के पदों पर तैनात रहे। आजादी के बाद यहां उद्यान निदेशालय सहित सरकारी विभागों के कार्यालय खुले। 1962 मे चीन युद्ध के बाद एसएसबी बनी तो इसका सेक्टर मुख्यालय रानीखेत में खुला, जिसे अब फ्रंटियर मुख्यालय का दर्जा मिला है । रानीखेत में कुमाऊं, नागा, कुमाऊं स्काउट्स रेजीमेंट और 99 पर्वतीय ब्रिगेड की मौजूदगी भी इसके महत्व को दर्शाती है। तमाम सुविधाओं और जरूरतों को आधार बनाकर रानीखेत क्षेत्रवासी अलग जिले की मांग करते रहे हैं।
1984 में बड़ा जनआंदोलन हुआ। 1987 में यूपी सरकार की बैंकटरमानी समिति ने और1989 में आठवें वित्त आयोग ने इसकी संस्तुति की। इसके बाद लगातार यह मांग उठती रही, लेकिन जिला नहीं बन सका,उल्टे कई सरकारी कार्यालय यहां से अन्यत्र चले गए। 1995 में तत्कालीन यूपी सरकार ने जिले के आश्वासन के साथ यहां अपर जिलाधिकारी और पुलिस क्षेत्राधिकारी की भी नियुक्ति की। बाद में अपर जिलाधिकारी को यहां से हटा दिया गया। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद तहसीलें तो बनीं, लेकिन जिला नहीं बन सका। 2011 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने जिले की घोषणा की, लेकिन वह भी छलावा साबित हुई। इधर, कैबिनेट की बैठक में जिलों पर चर्चा नहीं होने से लोग मायूस हैं।