सालों बाद भी शासन और प्रशासन की संवेदनहीनता के चलते जिले के आपदा प्रभावित परिवारों का विस्थापन नहीं हो सका है।
जिले के सत्रह गांवों के 316 आपदा प्रभावित परिवारों को दो से पांच साल बीतने के बाद भी विस्थापन का इंतजार है। जिले से भेजे गए प्रस्ताव शासन के ठंडे बस्ते में हैं।
यह परिवार किराए के भवनों, स्कूलों और पंचायत घरों में रहकर किसी तरह दिन काट रहे हैं। जिले में 2010 की भीषण आपदा में 36 लोग मारे गए थे। सैकड़ों की संख्या में पालतू मवेशियों की भी मौत हुई थी।
कई गांव भूस्खलन की चपेट में आए थे। अल्मोड़ा तहसील के बल्टा, बूढ़ाधार, बल्टा-बाड़ी, देवली, भूल्यूड़ा, बजेठी, सिराड़, मालता गांव आपदा से अधिक प्रभावित हुए थे।
तब इन गांवों के 139 परिवारों को गांवों के निकट ही सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित करने को जिला प्रशासन ने भूमि चयनित की थी।
वहीं 2013 में अल्मोड़ा तहसील के ल्वेटा, खैरखेत, थालागूंठ, तहसील भनोली के काना, नैकाना, दुनाड़, चौखुटिया तहसील के बसरखेत, रानीखेत तहसील के इंद्रा बस्ती, तहसील सल्ट के रगड़गाड़ में भूस्खलन से खतरा हो गया था। इन क्षेत्रों के 177 परिवार दूसरे स्थानों पर विस्थापित करने के लिए चयनित किए गए थे।
2010 से अब तक पांच वर्ष बीतने को हैं पर 316 आपदा प्रभावित परिवारों के लिए शासन-प्रशासन विस्थापन को जमीन की व्यवस्था नहीं कर सका है।
आपदा प्रभावित यह परिवार किराए के मकानों, स्कूलों, पंचायतों में रहने को मजबूर हैं। जाड़े और बरसात के मौसम में इन परिवारों की दिक्कतें बढ़ जाती हैं।
शासन और प्रशासन की उदासीनता के खिलाफ यह परिवार कई बार आंदोलन भी कर चुके हैं, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।