चौबटिया उद्यान गार्डन में सेब के पौधों की नर्सरी। संवाद न्यूज एजेंसी
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। उद्यान निदेशालय चौबटिया का गौरवशाली अतीत फिर से लौटने की उम्मीद है। अमेरिकी सेब के लालच में डेढ़ दशक पहले गार्डन से स्वदेशी प्रजाति के पेड़ों को काट दिया गया था, पर अमेरिकी प्रजाति यहां सफल नहीं हो सकी। ऐसे में गार्डन में फिर से रेड डेलीसेस, फैनी, अर्ली सनोरी, राइमर जैसी स्वेदशी सेब के मदर प्लांट को संरक्षित करने की कवायद शुरू कर दी गई है। नर्सरी में आठ हजार पौध उगाई गई हैं, जिनमें से तीन हजार पौध यहीं गार्डन में लगेंगे।
1953 में चौबटिया में 106.91 हेक्टेअर भूमि पर बगीचा और रिसर्च सेंटर स्थापित किया गया था। एक जमाने में उद्यान निदेशालय की देखरेख में चौबटिया उद्यान में 400 क्विंटल सेब का उत्पादन होता था, लेकिन समय बीतने के साथ यह गार्डन तंत्र की बेरुखी का शिकार हो गया। हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड में भी यहीं के रिसर्च सेंटर से सेब के पौधे जाते थे। 2005-06 में बगीचे में स्वदेशी प्रजाति के सेब के पौधों का सफाया कर अमेरिकी रेड फ्यूजी, रेड चीफ, डे बर्न जैसी बौनी प्रजाति के पौधे लगाए गए। पर ये पौधे यहां की जलवायु में पनप नहीं पाए। ऐसे में फिर से स्वदेशी सेब के मदर प्लांट को संरक्षित किया जा रहा है। साथ ही कुछ विदेशी प्रजाति के पौधो की नर्सरी भी तैयार की जा रही है। किसानों की डिमांड पर यहां से पौधे भेजे जाएंगे।
स्वेदशी प्रजाति के सेब फायदे का सौदा हैं। नर्सरी में ग्रोथ अच्छी है और तीन से चार साल में फल लगने लगेेंगे। स्वदेशी प्रजाति के एक पेड़ में पांच-पांच क्विंटल तक उत्पादन होता है। इस बार गार्डन में सेब का उत्पादन बढ़ा है। पिछले साल 12 क्विंटल हुआ था जबकि इस बार 42 क्विंटल सेब का उत्पादन हुआ है। -दामोदर जोशी, ज्येष्ठ उद्यान निरीक्षक, उद्यान निदेशालय चौबटिया।