उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड की आगामी चार सालों में राज्य के पांच पर्वतीय जिलों में 650 हेक्टेयर इलाके में चाय बागान विकसित करने की योजना है। भारतीय चाय बोर्ड इसके लिए जहां सब्सिडी देगा, वहीं इसमें नाबार्ड की भी मदद ली जाएगी।
बोर्ड की दो-तीन स्थानों पर नई चाय फैक्ट्री लगाने की भी योजना है। अब तक प्रदेश के आठ पर्वतीय जिलों में 1140 हेक्टेयर क्षेत्र में चाय बागान विकसित किए जा चुके हैं।
उत्तर प्रदेश शासनकाल में 1996 में चाय विकास बोर्ड की स्थापना हुई। बोर्ड ने चाय की खेती के लिए उपयुक्त पर्वतीय क्षेत्र में चाय उत्पादन की योजना तैयार की।
राज्य बनने के बाद उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के माध्यम से प्रदेश के बागेश्वर, नैनीताल, अल्मोड़ा, चंपावत, पिथौरागढ़, चमोली, पौड़ी और रुद्रप्रयाग जिलों में विभिन्न स्थानों पर चाय बागान विकसित किए गए। अब तक बोर्ड प्रदेश में 1140 हेक्टेयर क्षेत्र में चाय बागान विकसित कर चुका है। चालू वित्तीय वर्ष में 66,222 किलो चाय का उत्पादन हुआ है।
चाय विकास बोर्ड ने आगामी चार सालों में प्रदेश के पांच जिलों में 650 हेक्टेयर क्षेत्र में चाय बागान विकसित करने की योजना बनाई है। बोर्ड का करीब 48.86 करोड़ रुपये की लागत से नैनीताल, चंपावत, चमोली में 150-150 हेक्टेयर और बागेश्वर, रुद्रप्रयाग जिले में सौ-सौ हेक्टेयर में चाय बागान विकसित करने का प्रस्ताव है।
इस प्रस्ताव को बोर्ड ने शासन को भेजा। प्रस्ताव के मुताबिक भारतीय चाय बोर्ड 1944.81 लाख की सब्सिडी देगा, जबकि मनरेगा योजना के अंतर्गत 1398.30 लाख रुपये खर्च होंगे। जबकि नाबार्ड से राज्य सरकार के अंशदान के रूप में 1543.21 लाख रुपये की मदद का प्रस्ताव किया गया है।
निदेशक उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड द्वारा शासन को दिसंबर में प्रस्ताव भेजा गया था। इसके बाद उद्यान एवं रेशम अनुभाग के अपर सचिव डा. मेहरबान सिंह बिष्ट ने इस संबंध में नाबार्ड की सहायता से योजना को धरातल पर उतारने के लिए वित्त सचिव और नाबार्ड के उच्चाधिकारियों को पत्र भेजा है।
प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर चाय की खेती के लिए भूमि चयनित की गई है। योजना को नाबार्ड की मंजूरी मिलने के बाद चाय बागान विकसित करने का कार्य किया जाएगा।
डा. बीएस नेगी, निदेशक, उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड।