आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले स्याल्दे ब्लाक के कई इलाकों में लोग पानी, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी तमाम समस्याएं झेल रहे हैं।
लोग कई किमी पैदल चलकर अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन वहां डाक्टर नहीं मिलते। दूसरी तरफ स्कूलों में शिक्षकों का अभाव है। समस्याओं को लेकर ग्रामीण कई बार आंदोलन भी कर चुके हैं, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।
स्याल्दे ब्लाक 1961 में सल्ट ब्लाक से अलग होकर अस्तित्व में आया। अलग विकासखंड बनने के बाद लोगों को क्षेत्र के विकास की कई उम्मीदें थी, लेकिन ग्रामीणों के विकास का यह सपना साकार नहीं हो रहा है।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र देघाट, अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्याल्दे समेत अन्य सरकारी अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं। लोग दूरस्थ इलाकों से इलाज के लिए यहां पहुंचते हैं, लेकिन डाक्टर नहीं होने के कारण उन्हें निराश लौटना पड़ता है।
क्षेत्र में सिंचाई नहरों की हालत भी अच्छी नहीं है। दूसरी तरफ कई जगह बिजली की लाइनें अस्त-व्यस्त हैं। विकासखंड का सराईखेत क्षेत्र चौलाई, मसाला उत्पादन, अखरोट और नीबू प्रजाति के फलों के उत्पादन के लिए मशहूर है तो लखौर घाटी की लखौरी मिर्च की अपनी अलग पहचान है।
पौड़ी, चमोली की सीमा से लगे नागचूला खाल के कई गांवों में नीबू, माल्टा, संतरा आदि का उत्पादन भी काफी मात्रा में किया जाता है, लेकिन बिक्री की उचित व्यवस्था नहीं होने से काश्तकारों को उत्पादित फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है।
लोग अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्याल्दे का उच्चीकरण करने, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र देघाट में खाली पद भरने, जौरासी को पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने, ब्लाक में एफसीआई गोदाम बनाने, देघाट में पॅालीटेक्निक और केंद्रीय स्कूल की स्थापित करने, ब्लाक मुख्यालय में हाईटैक शौचालय बनाने, विनोद नदी और मसाणगढ़ी नदी में तटबंध बनाने सहित कई समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन करते रहे हैं लेकिन इन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।