जज्बा और जुनून हो तो कामयाबी जरूर मिलती है। यह कर दिखाया सैन्य अफसर बने हसन खान ने। अभावों के बावजूद उन्होंने ऊंचा मुकाम हासिल किया। उनकी कामयाबी के पीछे माता-पिता का भी भरपूर योगदान है। उन्होंने अपने बच्चों को ऊंचा ख्वाब दिखाया और इसे हासिल करने के लिए प्रेरित भी किया।
हसन के पिता अकरम खान ट्रेड्समैन पद पर सेना में भर्ती हुए थे और 2004 में नायक पद से उन्होंने सेवानिवृत्ति ली। आर्मी की नौकरी ने उन्हें जीवन में आगे बढ़ने का मंत्र दिया। स्वयं बहुत कम पढ़े होने के बाद अकरम ने शिक्षा के महत्व को समझा। तीनों बेटों हसन, हैदर और अल्फाज को अल्मोड़ा के केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाया। मामूली पेंशन से बच्चों की पढ़ाई और परिवारा का मुश्किल था। 2008 में 130 टीए पर्यावरण बटालियन पिथौरागढ़ में नौकरी करने लगे। परिवार की आर्थिक स्थिति में हाथ बंटाने के लिए मां रजिया बेग भी पातालदेवी स्थित आल्पस दवा फैक्ट्री में काम पर जाने लगीं। माता-पिता की मेहनत रंग लाई। हसन अब सेना में अफसर हैं।
हसन का छोटा भाई हैदर केंद्रीय विद्यालय से इंटरमीडिएट करने के बाद अब देहरादून में सिविल इंजीनियरिंग में पॉलीटेक्निक कर रहा है और तीसरा भाई केवी में 10वीं का छात्र है। अकरम खान और रजिया बेगम की तमन्ना हसन की तरह ही दोनों बेटों को सेना में अफसर बनता देखने की है। वह कहते हैं माता-पिता किसी की तकदीर भले ही नहीं लिख सकते हैं, लेकिन अच्छी तालीम और संस्कार देकर प्रेरित जरूर कर सकते हैं।
लक्ष्य हासिल करने को कड़ा परिश्रम जरूरी : हसन
अफसर बनकर अल्मोड़ा पहुंचने पर हुए स्वागत से हसन खान काफी खुश हैं। वह चाहते हैं उनकी ही तरह नगर के दर्जनों युवा हर साल आर्मी में अफसर बनें। इसके लिए उन्होंने युवाओं को लक्ष्य से कभी नहीं डिगने का मंत्र दिया है। हसन कहते हैं कि परिणाम की परवाह किए बिना लक्ष्य हासिल करने को कड़ा परिश्रम करना जरूरी है।