राहुल गांधी की अल्मोड़ा के सिमकनी मैदान में होने वाली रैली स्थगित हो गई। हालांकि रैली रद्द होने की वजह मौसम रहा, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थों पर चर्चा शुरू हो गई है। मौसम से रैली स्थगित क्या हुई मानो भाजपा को मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई। कांग्रेसियों में जोश भरने के लिए की गई इस रैली के नहीं होने से अब उनके मनोबल को धक्का जरूर लगा होगा। इसके अलावा रैली स्थल के चुनाव पर भी प्रदेश नेतृत्व पर भी सवाल उठेंगे ही।
क्या रैली स्थल का चयन सही था?
माना जा रहा है कि अल्मोड़ा से प्रदेश चुनाव का शंखनाद करने वाली कांग्रेस ने रैली स्थल का चुनाव बहुत सोच-समझकर नहीं किया। प्रदेश में कुछ दिनों से प्री-मानसून की बारिशें हो रही हैं। कई क्षेत्रों में सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं और भूस्खलन की घटनाएं सामने आई हैं। इसके बावजूद अल्मोड़ा में रैली क्यों की गई समझ से परे है। पंतनगर-हल्द्वानी-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग पर क्वारब के भूस्खलन से रास्ते कई दिनों से बंद है। यह जानते हुए भी कि रैली के समय मौसम कभी भी दगा दे सकता है उस समय वैकल्पिक मार्ग से कार्यक्रम स्थल पहुंचा जा सकता था, लेकिन लगता है इस पर जरा भी विचार नहीं किया गया। वैसे भी अल्मोड़ा के बजाय पंतनगर, हल्द्वानी, काशीपुर आदि मैदानी इलाकों में यह रैली की जा सकती थी लेकिन ऐसा नहीं कर शायद सही स्थान के चयन से कांग्रेस चूकी है।
कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर
कई दिनों से तैयारी में लगे कार्यकर्ताओं के जोश में जरूर इससे असर पड़ेगा। रैली को सफल और भव्य बनाने के लिए जमीनी स्तर पर नेताओं-कार्यकर्ताओं ने जी-तोड़ मेहनत की। कार्यक्रम में जुटी भीड़ इस बात की तस्दीक भी करती है। अब जब रैली रद्द हो गई तो जरूर नेताओं-कार्यकर्ताओं के मनोबल को धक्का लगना स्वाभाविक है। लोगों को दोबारा एकजुट करना इन नेताओं के लिए कोई आसान काम नहीं होगा।
क्या भाजपा को मिलेगा राजनीतिक लाभ?
भाजपा को इससे फायदा होगा यह कहना अभी जल्दबाजी होगा। हां यह जरूर है कि कांग्रेस की रैली रद्द होने से भाजपा ने राहत भरी सांस जरूर ली होगी। इस रैली से कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं में जोश जगाती और चुनाव में बीजेपी के सामने मजबूत से खड़ी रहती है, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। भाजपा प्रदेश में कई रैलियां कर अपने कार्यकर्ताओं में पहले से ही जोश भर चुकी है अब कांग्रेस की रैली रद्द होने से भाजपा के कार्यकर्ता खुद को मजबूत स्थिति में पा रही होगी। कहा जा सकता है कि मौसम ने भाजपा की मुराद पूरी कर दी।
कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती
रैली रद होने से कांग्रेस नेताओं के सामने अपने कार्यकर्ताओं के बीच जाने में थोड़ा हिचक जरूर होगी। जिन मुद्दों को लेकर कांग्रेसी जनता के बीच में जाकर उनका विश्वास हासिल करते थे उन्हीं मुद्दों को अगर राहुल गांधी अपनी रैली में कहते तो जनता के बीच पुख्ता तरीके से बात पहुंचती। अब कांग्रेस नेताओं के सामने अपने कार्यकर्ताओं को जनता के बीच जाकर फिर से विश्वास जीतना एक चुनौती होगी। इसका असर आने वाले चुनावों पर भी पड़ सकता है। यह मनोवैज्ञानिक दबाव कांग्रेस को नुकसान भी पहुंचा सकती है।
स्थानीय मुद्दों की कमी भी बनी चर्चा का विषय
रैली रद होने के बाद फोन से राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं को संबोधित तो किया लेकिन यह संबोधन साधारण था। ऐसा लगा मानो वह रैली में जोश भरने नहीं बल्कि मात्र अपनी उपस्थिति दर्ज करने आए थे। उन्होंने केंद्र सरकार को घेरने के लिए विदेश नीति, आर्थिक नीति, किसानों की दशा आदि पर तो चर्चा की लेकिन स्थानीय मुद्दों को छूने से बच गए। उत्तराखंड से सेना में अधिकतर लोग हैं उन्हें उनके संबोधन में कुछ सुनने को नहीं मिला। प्रदेश में कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए पार्टी की क्या योजनाएं हैं इस पर कोई वादा नहीं किया। ऐसे में कार्यकर्ता का जोश कैसे बना रहेगा यह प्रश्न कांग्रेस के सामने अभी भी खड़ा है।