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खास खबर: मटेली में दिखा दुर्लभ रत्नमुखी कस्तूरी, गांव के मनोज ने कैमरे में किया कैद; देखने वालों की होड़ मची

Wed, 18 Jun 2025 01:24 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, अल्मोड़ा

सार

हवालबाग ब्लॉक के मटेला गांव में इन दिनों प्रकृति और वन्यजीव प्रेमियों के बीच एक खास उत्सुकता का माहौल है। गांव में दुर्लभ दिखाई देने वाला जीव मुखौटामुखी ताड़ कस्तूरी बिलाव देखा गया है, जो आमतौर पर हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में कम पाया जाता है।
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हवालबाग के मटेला गांव में कैमरे में कैद मुखौटामुखी ताड़ कस्तूरी बिलाव। स्वयं
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विस्तार
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अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से सटे हवालबाग ब्लॉक के मटेला गांव में इन दिनों प्रकृति और वन्यजीव प्रेमियों के बीच एक खास उत्सुकता का माहौल है। गांव में दुर्लभ और बेहद कम दिखाई देने वाला जीव मुखौटामुखी ताड़ कस्तूरी बिलाव ( रत्नमुखी कस्तूरी बिलाव) देखा गया है, जो आमतौर पर हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में कम पाया जाता है।

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मुखौटामुखी ताड़ कस्तूरी बिलाव एक निशाचर स्तनधारी जीव है। यह दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाया जाता है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी उपस्थिति बहुत ही कम देखी जाती है। इस रहस्यमयी जीव को पहली बार गांव के ही प्रकृति एवं पक्षी प्रेमी मनोज कुमार आर्या ने अपने कैमरे में कैद किया। सोशल मीडिया और गांव में इसकी तस्वीरें वायरल होते ही कई लोग इसे देखने खेतों, बागानों और जंगल में नजर फिराने लगे और यह कौतूहल का विषय बना रहा।

मुखौटा मुखी कस्तूरी बिलाव सर्वाहारी होता है। यह मुख्य रूप से फल, छोटे कीड़े-मकोड़े, पक्षियों के अंडे, और छोटे जीवों को खाता है। यह कुछ खास जंगली फलों का बीज फैलाव भी करता है, जो पारिस्थितिकी तंत्र में इसके योगदान दर्शाता है। यह आमतौर पर एक बार में दो से चार शावक जन्म देता है। गर्भावधि अवधि लगभग 60 दिनों की होती है। शावक जन्म के बाद कुछ हफ्तों तक पूरी तरह मां पर निर्भर रहते हैं।
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मुख्य विशेषताएं
ऊंचाई (लंबाई): लगभग 50 से 70 सेंटीमीटर तक (पूंछ को छोड़कर)।
पूंछ की लंबाई: 45 से 60 सेंटीमीटर।
वजन: औसतन 3 से 5 किलोग्राम।
रंग-रूप: मुखौटे जैसी चेहरे पर सफेद धारियां, गहरे भूरे या स्लेटी रंग का शरीर।
जीवनकाल: लगभग 15 से 20 वर्ष।
आवास: घने जंगल, फलदार पेड़ों वाले क्षेत्र व ऊंचाई वाले वन।
दिन में सुस्त, रात चुस्त
यह निशाचर जीव है, यानी दिन में छिपा रहता है और रात में सक्रिय होता है।
यह पेड़ों पर चढ़ने में माहिर है और अधिकतर समय पेड़ों पर ही बिताता है। अकेले रहना पसंद करता है।


जंगलों में धुंध के कारण मुखौटी मुखी ताड़ कस्तूरी बिलाव जैसे दुर्लभ वन्यजीव अब मानव बस्तियों की ओर दिखाई दे रहे हैं। यह प्रकृति के संतुलन की ओर लौटने का संकेत है और इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। - मोहन राम रेंजर अल्मोड़ा

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