पहाड़ पर ट्रेन कब चढ़ेगी यह सवाल आज भी फाइलों में कैद है। हर बार के रेल बजट की तरह इस बार भी क्षेत्र के लोगों को रामनगर-चौखुटिया रेल लाइन को लेकर बड़ी उम्मीदें हैं।
केंद्र की दो सरकारों द्वारा रेल लाइन के सर्वे को स्वीकृति दिए जाने के बावजूद बजट का प्रावधान नहीं रखा गया। रेल लाइन के बनने से दो लाख की आबादी को प्रत्यक्ष लाभ मिलने के साथ ही रोजगार के अवसर बढ़ने से पलायन पर लगाम लगेगी।
रामनगर से चौखुटिया तक पटरी बिछाने के लिए अंग्रेजों के शासनकाल में भी सर्वे हुआ था। इसके बाद 1983 में सामरिक दृष्टि से जरूरी होने के चलते रेलवे अधिकारियों ने दो बार सर्वे करने के बाद सकारात्मक रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपी। कुछ सालों तक मामला ठंड़ा रहा।
इसको लेकर प्रभावी पहल 1989 में अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ के तत्कालीन संासद सीएम हरीश रावत के कार्यकाल में हुई थी, लेकिन सकारात्मक रिपोर्ट के बावजूद मामला आगे नहीं बढ़ पाया।
कांग्रेस सरकार ने दूसरे कार्यकाल में मार्च 2009 में रेल मार्ग के सर्वे की स्वीकृति दी, लेकिन इसके लिए बजट का प्रावधान नहीं किया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री हरीश रावत और तत्कालीन सांसद प्रदीप टम्टा के प्रयासों से रेल मंत्री ने रेल लाइन निर्माण को 2014 में सर्वेक्षण के लिए शामिल कर लिया, परंतु फिर भी रेल लाइन निर्माण का शुरू नहीं हो पाया।
पिछले साल सांसद अजय टम्टा के प्रयासों से केंद्रीय बजट में सर्वे की बात तो कही गई परंतु इसके लिए बजट नहीं रखा गया। श्री टम्टा ने गत दिनों रेल मंत्री से भेंट कर टनकपुर-बागेश्वर और रामनगर से वाया चौखुटिया गैरसैंण तक रेल लाइन सर्वे के लिए बटज का प्रावधान रखने की मांग की है।
अब देखना है कि रेल लाइन को लेकर अर्से से छले गए लोगों को इस बार कुछ हासिल होता है या फिर गत वर्षों की तरह हाथ मलतते रहना पड़ता है।