आम उत्पादन के लिए मशहूर रामगंगा घाटी सहित चैकोट क्षेत्र के लोगों को इस बार निराशा हाथ लग सकती है। अप्रैल दूसरे पखवाडे़ से पेड़ों पर चैंपा रोग लग जाने से 70 प्रतिशत आम अभी तक पेड़ों से झड़ चुका है। जिस कारण काश्तकारों के साथ ही आम के ठेकेदारों का भी मुनाफा कमा लेने का सपना अधूरा रह सकता है।
चैकोट तथा रामगंगा घाटी क्षेत्र में आम उत्पादन ही अधिकांश ग्रामीणों का आय का जरिया है। हर साल यहां 1200 से 1600 मीट्रिक टन आम की पैदावर होती है इस बार बारिश नहीं होने के वजह से पेड़ों पर चैंपा रोग ने बौर आने के वक्त ही अपने दस्तक दे दी है। बाकी कसर तेज हवाओं ने पूरी कर दी है। अब तक पेड़ों पर नाममात्र को ही आम रह गया है रोग लगने से जहां किसानों को मायूसी हुई है वहीं आम तोड़ने और ढोने वाले मजदूर, ट्रासंपोर्ट व्यवसायी तथा आम के थोक व्यापारी भी इससे चिंतित दिखाई दे रहे हैं।
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चैंपा रोग बौर आते वक्त ही आम के पेड़ में लग जाता है। बारिश न होने की वजह से शहद की तरह पेड़ों से चिपचिपा पदार्थ गिरता है जो आम को गला देता है। इस रोग से नियंत्रण के लिए बौर आते समय ही पेड़ों पर मोनोकोटोफास या क्यूनालफोस दवा का छिड़काव करना होता है।
प्रमोद सिंह राणा, प्रभारी, उद्यान सचल दल।
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आम क्षेत्र के काश्तकारों की आजीविका का प्रमुख साधन है। सरकार को रोग से आम की पैदावार को हुए नुकसान का सरकारी तौर पर सर्वे कराकर प्रभावितों को उचित मुआवजा देना चाहिए।
प्रेमगिरि गोस्वामी, अध्यक्ष, जिला बागवान संगठन।