फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आंखों की रोशनी चली गई पर मंजिल पाने को बेकरार है पहाड़ की बेटी अंजू

विज्ञापन
अंजू बिष्ट। - फोटो : ALMORA
विज्ञापन
अल्मोड़ा। मंजिल उनको मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है। इस कहावत को सच साबित किया पहाड़ की बेटी अंजू बिष्ट ने। हाईस्कूल पास करने के बाद अंजू की दोनों आंखों की रोशनी चली गई लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। ब्रेल लिपि के माध्यम से डीएलएड करने के बाद अब वह नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड (नैब) संस्था में दृष्टि दिव्यांग बच्चों को पढ़ा रही हैं।
विज्ञापन

माल गांव की अंजू ने वर्ष 2013 में जीजीआईसी से हाईस्कूल पास किया। इसके बाद हादसे में उनकी दृष्टि छिन गई। परिजनों ने दिल्ली के एम्स में अंजू का उपचार कराया लेकिन दृष्टि नहीं लौटी। इस कारण उनकी पढ़ाई छूट गई। अंजू को दो साल घर में ही रहना पड़ा। इस दौरान अंजू को आगे की पढ़ाई की चिंता सताने लगी। वर्ष 2015 में वह गौलापार हल्द्वानी स्थित नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड (नैब) संस्था में गई। नैब में उन्होंने ब्रेल लिपि सीखी और फिर जीजीआईसी हल्द्वानी से इंटर की पढ़ाई ब्रेल लिपि से की। इसके बाद मुंबई से दो साल का डीएलएड कोर्स किया। पिता बची सिंह बिष्ट और माता हीरा देवी ने कदम-कदम पर बेटी हौसला बढ़ाया। अंजू अब उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय (यूओयू) से ब्रेल लिपि से बीए दूसरे साल की पढ़ाई कर रही हैं। बीए में उनके विषय हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य, इतिहास, राजनीति विज्ञान हैं। राजनीति विज्ञान उनका पसंदीदा विषय हैं। वर्तमान में अंजू नैब में कक्षा एक से आठवीं तक के बच्चों को पढ़ा रही हैं। स्नातक की पढ़ाई पूरी होने के बाद वह आगे विशेष बीएड करना चाहती हैं। अंजू का कहना है कि समाज को दिव्यांगों को सहानुभूति की दृष्टि से देखने के बजाय उन्हें सहयोग देना चाहिए।
ब्रेल लिपि सिखाने से पहले कराते हैं स्पर्श ज्ञान
दृष्टि दिव्यांग अंजू बिष्ट का कहना है कि दिव्यांग अपने को किसी से कमजोर न मानें। ब्रेल लिपि के माध्यम से वह भी शिक्षा ग्रहण कर मुकाम तक पहुंच सकते हैं। बताया कि ब्रेल लिपि सिखाने से पहले बच्चों को अनेक प्रकार से स्पर्श ज्ञान कराया जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे बच्चे इस भाषा में पकड़ बनाने लगते हैं। कुछ ही दिनों में सामान्य बच्चों की तरह वह भी इस लिपि के माध्यम से पढ़ाई करने लगते हैं।
विज्ञापन

बचपन से ही दृष्टिबाधित पूजा ने भी दिव्यांगता को दी मात
अल्मोड़ा। जिले के डीनापानी निवासी पूजा मेहता 75 प्रतिशत दृष्टि दिव्यांग है। बचपन से ही इस समस्या से जूझने वाली पूजा के हौसले बुलंद हैं। एडम्स गर्ल्स इंटर कॉलेज से आठवीं तक पढ़ने के बाद वह अल्मोड़ा से हल्द्वानी चली गईं। जीआईसी हल्द्वानी से ब्रेल लिपि से 12वीं की पढ़ाई की। इसके बाद महिला डिग्री कॉलेज हल्द्वानी से बीए किया। मुंबई से दो साल का डीएलएड किया। अब राजनीतिशास्त्र से एमए कर रही हैं। वह गौलापार के नैब में ही पढ़ा भी रही हैं। उन्होंने उत्तराखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (यूटीईटी) भी पास कर ली है। वह कहती हैं कि पिता बलवंत मेहता और माता सरस्वती मेहता समेत नैब संस्था ने हमेशा उन्हें सहयोग दिया है।
आज मनाई जाएगी लुइस ब्रेल की जयंती
अल्मोड़ा। लुइस ब्रेल का जन्म आज ही के दिन चार जनवरी 1809 में फ्रांस के छोटे से गांव कुप्रे में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिता साइमन रेले ब्रेल शाही घोड़ों के लिए काठी और जीन बनाते थेे। दृष्टि छिनने के बाद लुइस ने ब्रेल लिपि का आविष्कार किया। लुइस आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी खोज रही ब्रेल लिपि के माध्यम से आज हजारों दिव्यांग शिक्षा पूरी कर मुकाम हासिल कर रहे हैं। दृष्टिहीनों के लिए यह लिपि वरदान साबित हो रही है। राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ के सचिव डीके जोशी ने बताया कि लुइस की जयंती पर सोमवार दोपहर एक बजे से सचिव उपशाखा कार्यालय जयपुर हाउस में गोष्ठी होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें