तेंदुए का आतंक पूरे क्षेत्र में बरकरार है कैमरा ट्रैप में दिखाई दे रही तेंदुए की हलचल से उसके मेहलचौरा और महाकालेश्वर के इर्दगिर्द होने की बात तो स्पष्ट हो गई है, लेकिन शिकारी लखपत सिंह के दो दिन के अवकाश पर होने से तेंदुआ नहीं मारा जा सका है। यानी कि शिकारी के लौटने तक ग्रामीणों को दहशत के साए में ही जीना पड़ेगा। इस बीच फिर कोई हादसा हो जाए तो उसका जवाब देने वाला कोई नहीं है।
ग्राम पंचायत मेहलचौरा में तेंदुए के हमले से एक व्यक्ति की मौत के पांच दिन बाद भी तेंदुआ न तो पिंजरे में कैद हो पाया और नही मारा गया है। इधर, मेहलचौरा में व्यक्ति को शिकार बनाने के दो दिन बाद ही इस तेंदुए ने महाकालेश्वर में घोड़े को मारा डाला था।
वन विभाग के अधिकारियों द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप में तेंदुए की हलचल से उसके उसी क्षेत्र में होने की बात तो स्पष्ट हो गई है। लेकिन शिकारी लखपत सिंह रावत के दो दिन के अवकाश पर रुड़की जाने से विभाग के पास उनके लौटने का इंतजार करने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं है।
बताया गया है कि शिकारी लखपत सिंह के शनिवार शाम तक लौटने की संभावना है। प्रदेश में तेंदुआ मारने में पारंगत शिकारियों की कमी के चलते विभाग रावत पर ज्यादा निर्भर है। लोगों का कहना है कि यदि इस बीच कोई घटना हो गई तो क्या होगा। इस बाबत विभाग के पास भी कोई जवाब नहीं है।
इधर, तेंदुए के आतंक के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि बाजार क्षेत्र में भी लोग दहशत में हैं। विशेष रूप से स्कूली बच्चों को लेकर अभिभावक खासे चिंतित हैं।
वनों में आग और बाघ से जूझ रहे वन विभाग के कर्मचारियों के लिए भी दुश्वारियां कम नही हैं। विभाग में कर्मचारियों का ऐसा टोटा है कि एक कर्मचारी चार-चार बीट की जिम्मेदारी संभालने को मजबूर है। द्वाराहाट रेंज में ही 35 के सापेक्ष महज 17 कर्मचारी ही कार्यरत हैं।
हालात यह है कि क्षेत्रों की जिम्मेदारी अकेले संभाल रहे इन कर्मचारियों पर जंगली जानवरों के हमले की आशंका बनी रहती है। जंगल के झंझावतों से त्रस्त वन कर्मियों की परेशानी पर अभी किसी का ध्यान नहीं जा पाया है।