अल्मोड़ा। उच्च न्यायालय ने आरक्षित, संरक्षित वन क्षेत्रों, ईको पार्क, नदियों, झीलों, जल स्रोतों में प्लास्टिक, थर्माकोट से बनी सामग्री फेंकने पर पाबंदी लगा दी है। यदि किसी व्यक्ति ने प्रतिबंधित क्षेत्र में प्लास्टिक, थर्माकोल से बनी सामग्री फेंकी तो इसे उच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन माना जाएगा। पकड़े जाने पर ऐसे व्यक्ति को पांच हजार रुपए अर्थदंड से दंडित करने का प्राविधान है।
वर्तमान में पर्यावरण का संकट राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताजनक है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51-ए (जी) के तहत प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण वन, झीलों, नदियों, वन्य जीवों के संरक्षण में योगदान दे। इसके लिए पॉलिथीन, प्लास्टिक थर्माकोल पर रोक लगाने के लिए कई बार जागरूकता अभियान चलते रहे हैं, लेकिन दैनिक व्यवहार में प्लास्टिक थर्माकोल का प्रयोग बंद नहीं हुआ है।
इनके उपयोग से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दो दिसंबर 2016 को पारित आदेश में प्लास्टिक, थर्माकोल के प्रयोग, बिक्री, भंडारण को राज्य में प्रतिबंधित कर दिया है। वन विभाग ने उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन करने के लिए आरक्षित, संरक्षित वन क्षेत्र, जंगलों में स्थित ईको पार्कों, नदियों, झीलों, जल स्रोतों में प्लास्टिक-थर्माकोल से बनी थैली, पत्तलों, गिलास, कप, पैकिंग सामग्री का उपयोग प्रतिबंधित कर दिया है।
अल्मोड़ा वन प्रभाग के डीएफओ आरएस प्रजापति ने नागरिकों से पर्यावरण संरक्षण में सहयोग करने का आह्वान किया है। कहा कि यदि कोई व्यक्ति उक्त सामग्री का प्रयोग करते पकड़ा गया तो पांच हजार रुपए अर्थदंड से दंडित किया जा सकता है। उन्होंने लोगों से जूट, कपड़े के थैलों का प्रयोग कर पर्यावरण संरक्षण में सहयोग करने का आह्वान किया है। उन्होंने आदेश का पालन करने के लिए विभागीय अधीनस्थ अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं। उपजिलाधिकारियों, तहसीलों नगर पालिका अल्मोड़ा, छावनी परिषद रानीखेत के अधिशासी अधिकारी को भी पत्र भी भेजे हैं।