उपमंडल क्षेत्र के जंगल जल रहे हैं, मजदूरों और संसाधनों की कमी के कारण वन महकमा पहले ही दावानल पर काबू पाने के लिए लाचार नजर आ रहा था। अब रही-सही कसर जंगलों में गिर रहे चीड़ के पिरूल ने पूरी कर दी। इस बार वन विभाग ने पिरूल उठान का लाइसेंस तक निर्गत नहीं किया है। बीते साल तक कोयला बनाने वाली कंपनियों को लाइसेंस दिए जाते थे, कंपनी ग्रामीणों के माध्यम से पिरूल उठान का कार्य करती थी।
फायर सीजन अमूमन 15 मार्च से शुरू हो जाता है, दावानल की दृष्टि से पिरूल को काफी खतरनाक माना जाता है। वन विभाग पहले ही कोयला अथवा अन्य सामग्री बनाने वाली कंपनियों को पिरूल उठाने का लाइसेंस देती थी, पिछले वर्ष तक काशीपुर की सुयस कंपनी पिरूल उठाने का लाइसेंस दिया जाता था, कंपनी पिरूल से टिकली का कोयला बनाती थी, इससे जहां जंगलों में आग की घटनाएं कम होती थी, वहीं ग्रामीणों को एक रूपया प्रति किलो पिरूल के हिसाब से भुगतान किया जाता था। वन क्षेत्राधिकारी पूरन चंद्र तिवारी ने बताया कि इस बार पिरूल उठान के लिए कहीं से भी निविदाएं नहीं लगी। अभी तक इसका ठेका नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा कि वनागिभन की घटनाओं को रोकने के लिए वन विभाग पूरी तरह से मुस्तैद है। जंगलों में छुटपुट घटनाएं हुई हैं। अलबत्ता असामाजिक तत्वों पर नजर रखी जा रही है। जो भी वनों को आग के हवाले करेगा पकड़े जाने पर ऐसे लोगों के खिलाफ जुर्माना किया जाएगा साथ ही कड़ी सजा भी दी जाएगी।