फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पंतनगर विवि, वीपीकेएएस मिलकर काम करेंगे

Thu, 26 Nov 2015 12:20 AM IST
ब्यूरो /अमर उजाला, अल्मोड़ा
विज्ञापन
विज्ञापन
 कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्र में खेती को बढ़ावा देने के लिए पंतनगर कृषि विवि और विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (वीपीकेएएस) अल्मोड़ा मिलकर काम करेंगे। अधिक लोगों को खेती से जोड़कर रोजगार के अवसर पैदा करने के प्रयास किए जाएंगे ताकि पलायन पर भी रोक लग सके। पंतनगर विवि के कुलपति डॉ. मंगलाराय और वीपीकेएएस के निदेशक डॉ. अरुणव पटनायक ने यह जानकारी दी।
विज्ञापन


वीपीकेएएस सभागार में पहुंचे पंतनगर कृषि विवि के कुलपति डॉ. राय ने पत्रकारों को बताया कि पर्वतीय क्षेत्र में कृषि विकास की अनेक संभावनाएं हैं। कुलपति ने बताया कि यहां किस तरह की खेती को बढ़ावा दिया जाए और इसके लिए क्या खास करने की जरूरत है। इसके अध्ययन के लिए उन्होंने पिछले तीन चार दिनों में लोहाघाट, चंपावत, पिथौरागढ़, बागेश्वर, ग्वालदम, अल्मोड़ा क्षेत्र का भ्रमण किया।

 उन्होंने बताया कि पंतनगर विवि, वीपीकेएएस संयुक्त रूप से काम करके किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराने से लेकर प्रशिक्षण, विपणन आदि क्षेत्रों में भी मदद देंगे। डॉ. राय ने कहा कि वीपीकेएएस ने बीजों की कई महत्वपूर्ण प्रजातियां खोजी हैं। साथ ही पर्वतीय कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई अन्य अनुसंधान किए हैं।
विज्ञापन


पहाड़ के अनुरूप उपकरण भी बनाए हैं। दूसरी तरफ पंतनगर विवि भी तकनीकी हस्तांतरण समेत ट्रेनिंग, किसानों में दक्षता बढ़ाने के लिए पूरी मदद करने को तैयार है। डॉ. राय ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र में सब्जी, फल उत्पादन, मशरूम, फूलों की खेती, मत्स्य पालन, पशुपालन आदि क्षेत्रों में काम करने की काफी संभावनाएं हैं।

 दोनों संस्थान मिलकर किसानों को उचित मार्ग निर्देशन देंगे। खेती को बढ़ावा मिलने से रोजगार के अवसर पैदा होंगे और पहाड़ से पलायन रुक सकेगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस दिशा में सिर्फ सरकारी मदद से ही काम नहीं बनने वाला है। किसानों को भी आगे बढ़कर काम करना पड़ेगा। इस मौके पर जाने माने विशेषज्ञ डॉ. आरके गुप्ता, डॉ. वाईपीएस डबास, डॉ. वीर सिंह सहित कई कृषि वैज्ञानिक मौजूद थे।

अल्मोड़ा। पंतनगर कृषि विवि के कुलपति डॉ. मंगला राय ने कहा कि पहाड़ में जंगली जानवरों से फसल को बचाने के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। पत्रकारों द्वारा जंगली जानवरों के आतंक से किसानों द्वारा खेती छोड़ने, इसके विकल्प के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में डॉ. राय ने यह बात कही।

उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू होने से पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। उन्होंने कहा जानवरों को बचाने के साथ ही खेती को बचाना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि 1970 में करीब 140 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती थी। 2015 में भी लगभग इतने ही क्षेत्र में खेती हो रही है। आबादी तीन गुना बढ़ गई है लेकिन जोत क्षेत्र बिल्कुल नहीं बढ़ा है, हालांकि कृषि की उन्नत तकनीक के जरिये उत्पादन बढ़ा है।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें