अल्मोड़ा। हिंदकुश हिमालय की सेहत सुधारने और इन क्षेत्रों में जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए आठ देश मिलकर काम करेंगे। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयन पर्यावरण संस्थान की पहल पर यह होगा। हिंदकुश हिमालयी क्षेत्रों में शामिल भारत के साथ ही भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार में संस्थान के वैज्ञानिक इन देशों के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर हिमालयी क्षेत्रों में जल संसाधन प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र सेवा प्रबंधन और टिकाऊ आजीविका की रुपरेखा गढ़ेंगे।
जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयन पर्यावरण संस्थान कोसी में सोमवार को कार्यशाला हुई, जिसमें देश भर के 11 हिमालयी राज्यों नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, आसाम, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, लद्दाख के वैज्ञानिक जुटे। सभी ने हिमालयी क्षेत्रों में पिघलते ग्लेशियर, बंजर होती जमीन और सूखते जल स्रोतों पर चिंता जताई।
संस्थान के निदेशक प्रो. सुनील नौटियाल ने बताया कि आज पर्यावरण असंतुलन विश्व की चिंता बन गया है। ऐसे में इसके संरक्षण के लिए काम करने की जरूरत है। बताया कि संस्थान पर्यावरण संतुलन के लिए हिमालयी क्षेत्रों की बंजर जमीन को हरा-भरा, सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए कार्य करेगा। यह काम हिंदकुश हिमालय के आठ देशों के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर किया जाएगा, ताकि पूरे विश्व में पर्यावरण की सेहत सुधारी जा सके।
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बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण का हिमालयी क्षेत्रों में पड़ रहा है प्रभाव
अल्मोड़ा। वैज्ञानिकों ने कहा कि इस योजना का उद्देश्य हिमालय की सेहत सुधारना है। कहा कि बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण का बुरा प्रभाव हिमालय पर पड़ रहा है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। एफसीडीओ से जुड़े जॉन वॉरबर्टम ने बताया कि विभिन्न देशों की संस्थाएं मिलकर जलवायु परिवर्तन से हो रहे बदलावों को कम कर सकती हैं।
आईसीआईएमओडी के निदेशक शेखर घिमरे ने कहा कि मौसम में बदलाव के कारण अप्रत्याशित आपदाएं, भूस्खलन जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। सभी संस्थाएं मिलकर ठोस कार्ययोजना के साथ पर्यावरण की सेहत सुधारने का काम कर सकती हैं। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आईडी भट्ट ने बताया कि तकनीकों का सहारा लेकर हिमालयी राज्यों में जल स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाएगा। पिघलते ग्लेशियरों को बचाने की योजना पर भी काम होगा।
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वैज्ञानिक तकनीक से लगाया जाएगा आपदा का पूर्वानुमान
अल्मोड़ा। कार्यशाला में मौजूद सांसद अजय टम्टा ने संस्थान के साथ ही सभी विशेषज्ञों के प्रयास को सराहा। उन्होंने कहा कि संस्थान पर्यावरण संरक्षण के लिए सराहनीय कार्य कर रहा है। वहीं प्रो. सुनील नौटियाल ने बताया कि वैज्ञानिक तरीकों से जलवायु परिवर्तन के कारणों का पता लगाया जाएगा। वहीं इससे आपदाओं का भी पूर्वानुमान लगाया जा सकता है, जिसका लाभ पूरे विश्व को मिलेगा।