फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अब हुड़के की थाप पर नहीं होती धान की रोपाई

Tue, 04 Jul 2017 10:23 PM IST
अल्मोड़ा़,अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन
हुड़किया बौल पर इस तरह रोपाई करते थे लोग। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
 घाटी क्षेत्र में हुड़किया बौल के साथ धान की रोपाई की परंपरा अब खत्म होने के कगार पर है। इस सीजन में धान की रोपाई का काम अंतिम चरण में है, लेकिन अभी तक किसी ने भी हुड़किया बौल नहीं लगाया है।
विज्ञापन


सोमश्वर घाटी के सिरखेत, नाखेत, तालखेत, पल्यूड़ख़ेत, आदि इलाकों में मुख्य फसल धान ही है। वर्षों से यहां हुड़किया बौल के साथ धान की रोपाई की जाती रही है। एक दशक पूर्व तक महिलाएं हुड़किया बौल के साथ धान की पौध की रोपाई करती थीं। नौकरीपेशा लोग भी धान की रोपाई से समय गांव आते थे। लोग सुबह से शाम तक धान की रोपाई में व्यस्त रहते थे। पिछले सालों में सुअरों और बंदरों द्वारा फसल को नुकसान पहुंचाने,  कृषि जोत छोटी होने, समय पर बारिश नहीं होने और नहरों के क्षतिग्रस्त होने से रोपाई के लिए खेतों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंचता। लोगों में सामूहिकता की वो भावना भी नहीं रही। यही वजह है कि हड़िकिया बौल की परंपरा समाप्त प्राय: हो गई है।

अब तो लोगों का अधिकांश समय रोपाई के लिए पानी की व्यवस्था करने में बीत रहा है। कई लोग कोसी और साईं नदी से जेनरेटर के माध्यम से पंपिंग कर खेतों में पानी पहुंचा रहे हैं। लोक संस्कृति से जुड़े लोगों का कहना है कि हुड़किया बौल की परंपरा यहां की खेती और संस्कृति से जुड़ी है। इस विधा को संरक्षित करने की जरूरत है।            
विज्ञापन


क्या है हुड़किया बौल
हुड़किया बौल के अंतर्गत लोक कलाकार रोपाई करने वालों के आगे हुड़के की थाप पर दैण होया भूमि का भूमियाला देवा जैसे लोक गीतों से रोपाई की शुरुआत कराते थे। राजुला मालूशाही, हरुहीत आदि की लोक गाथाएं गाई जाती हैं। कलाकारों के साथ गीतों को दोहराकर महिलाएं धान की पौध रोपती जाती थीं। इससे पानी से भरे खेतों में काम की थकान बिल्कुल भी महसूस नहीं होती थी। मनोरंजन के साथ काम का इससे बेहतर तरीका और कोई नहीं था।
विज्ञापन



 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें