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निष्प्रयोज्य चीड़ के बगेट से बनाई मां नंदा सुनंदा की जीवंत कलाकृति

Fri, 10 May 2019 11:52 PM IST
दीपक नेगी अल्मोड़ा।
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चीड़ के बगेट से निर्मित मां नंदा सुनंदा की कलाकृति। - फोटो : amar ujala
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नगर के त्यूनरा निवासी धीरेंद्र कुमार पांडे को चीड़ वृक्ष की छाल (बगेट) से कलाकृतियां बनाने में महारत हासिल हैं। उन्होंने कुमाऊं की प्रसिद्ध देवी मां नंदा सुनंदा और निर्भया कांड पर आधारित दो सुंदर कलाकृतियां बनाई है जो जीवंत लग रही हैं। उनके हाथों में ऐसा हुनर है कि जो कोई भी इन दोनों कलाकृतियों को देखेगा उसे विश्वास ही नहीं होगा कि यह कुमाऊं के जंगलों में पाए जाने वाला निष्प्रयोज्य चीड़ वृक्ष की छाल (बगेट) से बनाई गई हैं।
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धीरेंद्र कुमार पांडे को बचपन से ही पेंटिंग बनाने का शौक रहा है। नौकरी के दौरान ही उनका रुझान वुडन क्राफ्ट की ओर गया। जयपुर में एक प्रतिष्ठित कंपनी में 29 साल सेवा करने के  बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अल्मोड़ा आ गए। धीरेंद्र ने चीड़ वृक्ष की छाल (बगेट) से कुमाऊं की प्रसिद्ध देवी मां नंदा सुनंदा और निर्भया कांड पर आधारित दो सुंदर कलाकृतियां बनाई हैं। नंदा सुनंदा कलाकृति काफी जीवंत लग रही हैं। इसके अलावा उन्होंने 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए निर्भया कांड पर आधारित कलाकृति बनाई है। जिसमें पीड़िता के चेहरे पर दर्द और आंखों से निकले आंसू को चित्रित किया है। धीरेंद्र का कहना है कि उत्तराखंड की जनता में नंदा सुनंदा के प्रति विशेष सम्मान है। नंदादेवी मेले में प्रेरणा लेकर ही उन्होंने नंदा सुनंदा की सुंदर कलाकृतियों का निर्माण किया है। दोनों कलाकृतियों को बनाने में चार-चार दिन लगे हैं। धीरेंद्र अपनी कलाकृतियों में मानवीय संघर्ष, पर्यावरण, नारी शिक्षा, सशक्तिकरण, पलायन, रिश्तों में टूटन आदि मुद्दों को प्रमुखता से दर्शाते हैं। धीरेंद्र का कहना है कि वह राज्य की लुप्त होती हस्तशिल्प कला को पहचान दिलाने में जुटे हैं। 

अब तक बना चुके हैं 50 से अधिक कलाकृति
अल्मोड़ा।
धीरेंद्र कुयांमार पांडे चीड़ के बगेट से इन दिनों भगवान श्री गणेश, शिवालय तथा अवसाद शीर्षक पर आधारित कलाकृति बनाने में जुटे हैं। वह अब तक लार्ड बुद्धा,  योग कर्मसु कौशलम्,  देवालयों को संरक्षित करें, काटे गए वृक्षों का दर्द, युवा शक्ति, वृक्ष बचाओ, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, नारी शक्ति, स्वास्थ्य, मंदिर बचाओ, पर्यावरण  समेत 50 कलाकृतियां बना चुके हैं। वह पिछले तीन वर्षो से अनवरत चीड़ के बगेट से कलाकृति बनाने का काम कर रहे हैं।
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कलाकृति निर्माण के लिए आसानी से नहीं मिलता है बगेट
अल्मोड़ा। चीड़ के छाल (बगेट) से कलाकृतियां बनाना आसान नहीं है। धीरेंद्र कुमार पांडे ने बताया कि कलाकृति बनाने के लिए मोटा और लंबे बगेट की जरूरत पड़ती है जो आसानी से नहीं मिलता है। इस कारण कई बार भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एक कलाकृति को बनाने में तीन से चार दिन तक लग जाते हैं। बगेट से कलाकृति बनाना कम खर्चीला है। इसके बावजूद लोगों का रूझान इस ओर कम है। 
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