भतरौंजखान और आसपास के करीब 50 किलोमीटर के दायरे में बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली मिर्च के पौधों तक को जंगली जानवर चट कर जा रहे हैं। नतीजतन, पिछले एक दशक में करीब 5000 से भी ज्यादा किसान खेती से मुंह मोड़ चुके हैं। इनमें से करीब 2000 से ज्यादा किसान परिवार सहित रोजगार की तलाश में शहरों में जाकर बस गए हैं।
क्षेत्र के लोगों का दावा है कि अगर सरकार खेती को संरक्षण दे तो मिर्च का हरा-भरा कारोबार फिर से संरक्षित हो सकता है। भतरौंजखान और आसपास के इलाको में मिर्च की खेती बहुतायत होती है। इसकी खेती यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करती थी लेकिन बदलते हालात के कारण अब पहले जैसी स्थिति नहीं रही है।
दूर-दूर तक थी मिर्च की मांग
इन गांवों में बहुतायत में होती थी मिर्च
कोश्याकुटौली, धूराफाट, फल्दाकोट,सल्ट, सिलोर, हरड़ा, मछोड़, टानी, चौनलिया, स्यो, महरखोला, चन्द्रकोट, - वगड्वार, विनकोट, रीठा, तौराड, नौघर और च्यूनी।
मिर्च की मशहूर प्रजाति-लाल, पीली, जामीरी और लखौरी।
बोले किसान-
जंगली सुअर, मोर, नील गाय आदि जानवर मिर्च के पौधे को थोड़ा सा बड़ा होते ही नष्ट कर देते हैं। इस कारण हमारे गांव सहित आसपास के कई गांवों के लोगों ने इसकी खेती छोड़ दी है। सरकार जंगली जानवरों से निजात दिलाए तो मिर्च की खेती दोबारा लहलहा सकती है।
मिर्च की खेती को वन्यजीवों के नष्ट कर देने से लोगों को काफी आर्थिक नुकसान हुआ है। सरकार को चाहिए कि वह फसल का संरक्षण करे। ऐसा करने से जो लोग पलायन कर गए हैं वे लौट के आ सकते हैं।
- कृष्णानंद डोर्बी
इलाके में मिर्च का इतना ज्यादा उत्पादन होता था कि हफ्ते में भतरौंजखान में रामनगर रोड पर दो बड़ी मंडियां लगती थीं जिनमें हजारों की संख्या में विक्रेता और खरीदार आते थे लेकिन घटते उत्पादन की वजह से अब केवल एक बाजार शनिवार को लगता है।
- प्रदीप पंत, अध्यक्ष व्यापार मंडल, भतरौंजखान
मिर्च की खेती कम हो रही है और पलायन बढ़ रहा है। सरकार को चाहिए कि वह खेती को संरक्षित करके पलायन रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए।
-हरीश भट्ट, वरिष्ठ व्यापारी नेता
जंगली जानवरों की वजह से खेती को नुकसान पहुंचा है लेकिन अब राज्य सरकार सीएम पलायन रोको योजना के तहत खेती की योजना को संरक्षित कर रहा है। इच्छुक किसानों की खेती को बचाने के प्रयास जारी है।