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स्वास्थ्य को अब राष्ट्रीय सुरक्षा का अंग बनाना जरूरी

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रानीखेत (अल्मोड़ा)। कोरोना की दूसरी लहर ने देशभर की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलकर रख दी है। सबसे अधिक प्रभाव पहाड़ी इलाकों में देखने को मिला है, जहां एक अदद सीटी स्कैन मशीन तक उपलब्ध नहीं हैं।
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इस बारे में विधि आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष दिनेश तिवारी का कहना है कि आजाद भारत में चारों ओर जनता ने ऐसा विनाश और हाहाकार पहली बार देखा और भोगा है।
सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं को राष्ट्रीय महत्व का विषय बनाना होगा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को जीडीपी का आठ प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करना होगा और ऐसा ही राज्य सरकारें भी करें तभी स्थिति में सुधार आएगा।
विधि आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर में सरकार जागी तो, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। देश में हजारों की संख्या में लोग असमय मौत की चपेट में आ गए।
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किसी ने अपने पिता को खोया तो किसी ने अपने बेटे को अपने सामने दम तोड़ते देखा। इन सबके बीच लोगों की जान बचाने के लिए दिन रात एक करने वाले चिकित्सक और स्वास्थ्य कर्मी देश में नायक बन कर उभरे।
कोरोना से लड़ाई में कई डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी पर्याप्त सुरक्षा और उपकरणों की कमी के चलते संक्रमित हुए और इनमें से कुछ अकाल मौत का ग्रास भी बन गए।
पूरे देश में बेड, वेंटिलेटर, जांच किट, मास्क, वैक्सिनेशन जैसे जरूरी उपकरणों की भारी कमी रही। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से जो कदम उठाए गए या उठाए जा रहे हैं वे अपर्याप्त हैं।
कोरोना की तीसरी लहर में ऐसा न हो इसके लिए सरकार को अभी से प्रयास करने होंगे और स्वास्थ्य सेवाओं को राष्ट्रीय महत्व का विषय बनाना होगा।
स्वास्थ्य में सबसे कम खर्च करता है भारत
रानीखेत। विधि आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष दिनेश तिवारी ने बताया कि भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1.6 प्रतिशत हिस्सा ही सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है।
यह ब्रिक्स देशों में सबसे कम खर्च है। आंकड़े देते हुए उन्होंने बताया कि अमेरिका स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का 8.5 प्रतिशत, जर्मनी 9.4 प्रतिशत, ब्रिटेन 7.1 प्रतिशत खर्च करते हैं।
पड़ोसी देश तक सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करते हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का बजट 2020-21 में लगभग 65 हजार करोड़ रुपये है जो भारत जैसे देश की बुनियादी स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।
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