फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Almora News: ताड़ीखेत के सिमाड़ी गांव हुआ बरगद और पीपल का विवाह

विज्ञापन
विज्ञापन
रानीखेत (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रकृति केवल जीवन का आधार नहीं, बल्कि आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। इसी सांस्कृतिक धरोहर का एक अनोखा उदाहरण है बरगद और पीपल के पेड़ों का पूजन एवं उनका विवाह संस्कार, जो आज भी गांव-गांव में श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
विज्ञापन

लोकमान्यताओं के अनुसार पीपल को भगवान विष्णु तथा बरगद को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। कई जगह देवी-देवताओं की छवि में इन्हें पति-पत्नी स्वरूप में स्थापित कर सभी वैदिक नियमों के साथ विवाह संस्कार किया जाता है। मंत्रोच्चार, नारियल पूजा, धूप-दीप, भोग प्रसाद और शुभ मुहूर्त सब कुछ बिल्कुल मानवीय विवाह की तरह। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का अनोखा लोक-विज्ञान भी है। पहाड़ों में जलस्रोतों को सुरक्षित रखने और पर्यावरण संतुलन के लिए इन वृक्षों का महत्व है। इसलिए पूजा और विवाह जैसी मान्यताओं के माध्यम से पीढ़ियों से लोगों को पेड़ों को संरक्षित करने का संदेश दिया गया है।
ग्रामीण मानते हैं कि बरगद-पीपल की पूजा से परिवार में सुख-समृद्धि आती है, संतान-सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है और गांव-समाज में सौहार्द बना रहता है। खास बात यह है कि आधुनिक समय में भी युवा पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है, और धार्मिक आस्था के साथ-साथ इसे धरोहर और पर्यावरण प्रेम की पहचान मानती है। बरगद और पीपल का विवाह जहां अध्यात्म, संस्कृति और प्रकृति संरक्षण तीनों एक साथ मिलते हैं, आज भी पहाड़ों में सामूहिक आस्था और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है।
विज्ञापन

-
हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को देवत्व का रूप दिया, तभी बरगद और पीपल का विवाह जैसे अनुष्ठान शुरू हुए। पीपल को विष्णु और बरगद को शिव का स्वरूप माना जाता है। यह केवल धर्म नहीं, प्रकृति और संस्कृति का संगम है। इस परंपरा से हम आने वाली पीढ़ियों को पेड़ों का संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान सिखाते हैं। जिस गांव में ऐसे पूजा-विवाह होते हैं, वहां सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
विज्ञापन

उमाशंकर पंत पुजारी, नीलकंठ महादेव मंदिर रानीखेत
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें