खजांची मोहल्ला निवासी रमेश चंद्र दास द्वारा रचित पंद्रह कुमाउंनी कहानियों का संग्रह ‘मन मंजरि और स्याव’कुमाउंनी साहित्य के लिए एक अच्छी उपलब्धि के तौर पर सामने आया है। कहानी संग्रह के लेखक रमेश चंद्र दास की स्कूली शिक्षा नहीं के बराबर है, लेकिन मन मंजरि और स्याव नामक पुस्तक में लिखी सटीक कहानियों से उन्होंने यह साबित किया है कि प्रतिभा किसी डिग्री की मोहताज नहीं होती।
इस कहानी संग्रह में कई रोचक कहानियां हैं जो यहां की आम बोलचाल वाली कुमाउंनी में लिखी गई हैं। इन कहानियों में हमारी संस्कृति और परंपरा की भी झलक मिलती है। लालच बुरी बला है कहानी हमें सचेत करती है कि परहित में ही अपना हित छिपा है। इस संग्रह की पहली कहानी मन मंजरि और स्याव है। इसके अलावा हाइ बिराऊ, सैमल नि खै भैमल खै, द्वि मुस, काव आपण में नाम नि धरन, मासै दाव, गदू, हुस्यार बुढ़ी, नरुलि और बल्द, आंख, रधुलि काखि आदि शीर्षकों से लिखी रोचक कहानियां शामिल हैं। पर्यावरण और जंगलों की सुरक्षा के बारे में भी एक अच्छी कहानी है जिसमें कहानी के नायक राजा द्वारा दिए गए सम्मान को नकारते हुए उन पेड़ों की सुरक्षा को महत्व देता है जो हम सबके लिए जीवनदायी हैं। दो चूहों की कहानी (द्वि मुस) अत्यंत रोचक ढंग से यह संदेश देती है कि ग्रामीण और शहरी जीवन की उठा पटक में आखिरकार ग्रामीण परिवेश ही हमें सच्चा सुकून दे सकता है। सैमल नि खै भैमल खै.. कहानी यह बताती है कि वहम इं
सान को किस कदर घोर नकारात्मक सोच की तरफ धकेल देता है। कहते हैं मौत अपने ऊपर दोष नहीं आने देती, इस कटु सच को भी एक कहानी में प्रस्तुत किया गया है।
कहानी संग्रह की हर कहानी कुछ अर्थ लिए है और कोई न कोई संदेश देती है। कहानी के लेखक रमेश चंद्र दास कहते हैं कि जीवन के शुरुआती दिनों से ही वह किसी न किसी तरह हुक्का क्लब की सांस्कृतिक और साहित्यिक परिवेश से जुड़े रहे। यही कारण रहा कि शिक्षित नहीं होने के बावजूद उन्हें यह कहानी संग्रह लिखने की प्रेरणा मिली। हुक्का क्लब के सचिव और वरिष्ठ रंगकर्मी शिवचरण पांडे का कहना है कि स्कूली शिक्षा नहीं के बराबर होने के बावजूद रमेश चंद्र दास ने अपनी कहानियों के जरिये खुद को अनुभवी कहानीकारों की श्रेणी पर खड़ा कर दिया है। उनकी कहानियों की सार्थकता देखते हुए ही संस्कृति निदेशालय ने पुस्तक के प्रकाशन के लिए 30 हजार रुपये की धनराशि भी दी है।